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आकार लेती यात्राएं

मोड़सींग ******* ( ३ ) लंबी कविता का अंतिम अंश ************************ जब कि सारी बस्ती गृहस्थिन की तरह पहनती बदलती रही चूड़ियां बिछुए भर्ती – भराती रही मांग गूंजती रही …

कस्बे की सेहत ************* ( अंश – १ ) व्यक्तिगत लड़ाई दो गांवों की और हो गया तबाह पूरा कस्बा कस्बा तो क्या वर्ग -वर्ण -सम्प्रदाय – जातियां बदल गये …

आइन्दा ****** उसकी जिंदगी में काम आने के लिए उसे अपना लहू दिया और वह जल्दी – जल्दी उसे साबुन से धोने लगा मैंने उसे टोंका —– यह क्या कर …

यहां जमीन पर ************ ओ, सदियों से सोई घाटियों ! तुम्हारे ऊपर पत्थरों की स्याह इबारतों में जो लिखा है उसे एकाध बार पढ़ तो लो ! कर लो चाहे …

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