आंगन ****** ( ५ ) बेचैनी की हद तक बेचैनी है आंगन देख – देख सूने ओटले पाल चौपाल जो मौसम की आनाकानी पर बेखटके होते धूप ,हवा, पानी जमीन …
आकार लेती यात्राएं
आंगन ****** ( २ ) उदास है आंगन यह देख कि महज आवाजाही के लिए खोले जाते किवांड़ कोई संध तक नहीं कि झांक कर देख सकें घर ( श्री …
मोड़सींग ******* ( ३ ) लंबी कविता का अंतिम अंश ************************ जब कि सारी बस्ती गृहस्थिन की तरह पहनती बदलती रही चूड़ियां बिछुए भर्ती – भराती रही मांग गूंजती रही …
कस्बे की सेहत ************* ( अंश – १ ) व्यक्तिगत लड़ाई दो गांवों की और हो गया तबाह पूरा कस्बा कस्बा तो क्या वर्ग -वर्ण -सम्प्रदाय – जातियां बदल गये …
आइन्दा ****** उसकी जिंदगी में काम आने के लिए उसे अपना लहू दिया और वह जल्दी – जल्दी उसे साबुन से धोने लगा मैंने उसे टोंका —– यह क्या कर …
यहां जमीन पर ************ ओ, सदियों से सोई घाटियों ! तुम्हारे ऊपर पत्थरों की स्याह इबारतों में जो लिखा है उसे एकाध बार पढ़ तो लो ! कर लो चाहे …
