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कस्बे की सेहत-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
कस्बे की सेहत
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( अंश – १ )
व्यक्तिगत लड़ाई दो गांवों की
और हो गया तबाह पूरा कस्बा
कस्बा तो क्या वर्ग -वर्ण -सम्प्रदाय – जातियां
बदल गये खूनी इरादों में
संघर्ष की आग के गोले में
आ सकते कभी भी शहर के शहर
जिला प्रान्त देश या कि विश्व
जरा से झटके में लौट कर आ जाता
तरक्की में लगा अमन पसंद आदमी
हजारों हजार साल पीछे को
कबीलों वाली दुनिया में
आपस में गले मिलने वाले
काटने लगते गले आपस के
शांति समितियों में घुसे
अशांत लोगों की पनाह पर
चलने लगते गुप्त अखाड़ों में
षड्यंत्रों के अभ्यास
ठीक ऐसे वक्त सच की
तस्वीर पहचानने का दावा लिए
आश्वासनों की पिटारियां खोलते
पत्रकारों के दल – बल के साथ
आ गये थे लोग राजधानियों से —
उड़ाते हुए सफेद कबूतर
वे आये तब पूरा कस्बा
दहशत के पंजों में जकड़ा
धो रहा था दामन में लगे मौत के धब्बे
ऐसे मातमी माहौल में उनके स्वागत को
खुलवाई कलारी , गुमटियां, कोठों की खिड़कियां
पक्ष में तैयार होने वाली रिपोर्ट के पक्ष में
तैयार किया एक माकूल मौसम तफ्तीश के लिए
शाम होते ही बिछा दी गयी
शहर भर में मोटी पर्त धुएं की
धाराओं के कानूनी जाल में फांसें गये रातोंरात
नगर के छोकरे ( एकाध बुजुर्गवार के साथ )
जिनमें से ज्यादातर यह भी नहीं जानते
कि लड़ने वाले वे सांड हैं कौन
गिरफ्तारी का कोटा पूरा करने के चक्कर में
पकड़े गये काले खां फकीर काले बुखार में
बड़बड़ाते रहे थाने से अस्पताल तक
बेहोशी में अपने मोहल्ले के
गोरे गुलाबी चेहरे वाले
चंचल अशोक का नाम ले लेकर कि
थिगती रहे उसकी पतंग अनंत में
हमेशा – हमेशा ऊंची उठती हुई ।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता बेहद संवेदनशील कविता कहीं जा सकती है ।यह भी माना जा सकता है कि यह आधुनिक भारत याने गुलामी के सैंकड़ों बरस के अनुभव के बाद उन्हीं के तौर तरीके अपनाता असंवेदनशील प्रशासन , उन्हीं की न्याय व्यवस्था का मुखौटा ओढ़े कानून और विधि विधान ,सत्ता के हथकण्डे ,प्रशासन के चापलूस ,चाटुकार और भ्रष्ट अफसर ।सब कुछ गुलाम भारत का आजाद सरकारी तंत्र । सम्प्रदाय के बीच मन मुटाव बढ़ाना ।नफरत के मसले खड़े करना ।फसाद की वजहों को बढ़ावा देकर समाज को कस्बों को उजाड़ने की साजिशें रचना ।बेगुनाह युवाओं को बेफजूल के आरोप लगा कर उन्हें जेलों में ,कैद खानों में बंद करना ।यह है सत्ता की असंवेदनशीलता ।न्याय तो इससे भी ज्यादा अनयन और अकर्ण है वह तो बरसों बरस बेगुनाहों की सुनवाई ही नहीं करता । यह है आधुनिक भारत की प्रशासनिक व्यवस्था ।जो केवल सत्ता की रक्षक है । जनता के लिए उसके सारे कानून विधि विधान बेरहम और चेतना शून्य है ।कविता के प्रारंभ में ही उजागर कर दिया है कि दो गांवों की व्यक्तिगत लड़ाई में किस तरह पूरे कस्बे को तबाह कर दिया जाता है ।कहावत है कि —” सांड सांड लड़े और बागुड़ का चूरा होय ” जिस लड़ाई या मन मुटाव से पूरे कस्बे का कोई लेना – देना नहीं लेकिन पूरे कस्बे को फसाद की आग में झौंका दिया जाये ।यह कितनी बड़ी नाइंसाफी है ? यह विचारणीय है ।इससे भी बड़ी चिन्ता और विचार करने की बात तो यह है कि पूरा कस्बा जो कि पढ़ा – लिखा है ।चेतना सम्पन्न और उन्नति कर चुका है वह भी हिन्दू – मुसलमान की कबिलाई मानसिकता में परिवर्तित हो जाता है और हिन्दु – मुसलमान के सम्प्रदाय में बंट कर आपस में नफरत ,लड़ाई ,मार – काट मचाने लगता है ।यह आधुनिक भारत के हिन्दुओं और मुसलमानो की जाहिल हरकत भर है ।उन डिग्रियों ,उपाधियों पर पानी फेरने जैसा कृत्य है जिन शिक्षा संस्थानों से इन्हें पाया गया है ।प्रमाण पत्रों , उपाधियों ,शिक्षा पा लेने भर से आदमी में अहिंसा,ज्ञान और सामाजिक चेतना पैदा नहीं होती वह अपने आचरण ,धारणाओं ,और विचारों में दकियानूसी रवैया अपनाए रह सकता है । औपचारिक शिक्षा मानवीय सोच और बोध पैदा नहीं करती तो शिक्षा उपाधियां व्यर्थ हैं ।यदि शिक्षा हमारा वैचारिक मज्जन नहीं करती तो वह शिक्षा पाने में बिताया गया समय व्यर्थ और अकारथ है ।आज यह विचारणीय है क्योंकि आज जिस तरह की नफरत , भेदभाव ,और हिंसक माहौल की चपेट में समाज सांसें ले रहा है वहां खड़े रहकर हमारे चांद को ,मंगल को छू लेने के करिश्में हमारा उपहास उड़ा रहे हैं हमने अभी अपने सम्प्रदाय के दायरों और संकीर्ण मानसिकता को तो छोड़ा ही नहीं ? फिर सारी तरक्की किस मायने की ? यह सोचने की बात है ।समाज जिस दिन आदमी आदमी में भेद करना बंद कर देगा उस दिन वह सही मायने में तरक्की करेगा ।सही मायने में आधुनिक बनेगा ।जिस दिन अमीर – गरीब ,ऊंच – नीच,जाति ,वर्ण वर्ग के दायरों को पार कर लेगा उसी दिन सही मायने में वह मनुष्यता के दायरों में शामिल हो जायेगा वरना प्रशासन और सत्ता तो हर समय उसके साथ षड्यंत्र रचती ही रहेगी । समाज युगों युगों तक केवल वस्त्र बदल बदल कर जीवन शैली बदलकर कभी पश्चिमी परिधान और कभी किसी विजातीय रहन सहन को अपनाता हुआ भद्र सभ्यता के गुमान में खोया रहेगा। यह कविता सामाजिक संबंधों और आधुनिक भारत की हकीकत खोलती कविता है ।यह कविता उस बदरंग समाज का यथार्थ उजागर करती है जो पूरी तरह से विचार शून्य और चेतना विहीन हो चुका है ।नकल जिसका वास्तविक जीवन रुप है ।अपने आपको टटोलना अपने आसपास को तलाशना ही कविता का सार है । (शेष अंश कल ) 🙏विनीता रघुवंशी

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