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आंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आंगन
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( ५ )
बेचैनी की हद तक
बेचैनी है आंगन
देख – देख सूने ओटले
पाल चौपाल
जो मौसम की
आनाकानी पर बेखटके होते
धूप ,हवा, पानी
जमीन से जुड़े किस्से- कहानी ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज की कविता में आंगन घर द्वार का मुहाना होता था जो अनाज की साफ- सफाई झटका फटकी और बतकही करने की जमावट की जगह होता था । बच्चों की चुलबुली करतूतों की हलचल से आबाद होता था आंगन ।आंगन घर-गृहस्थी का जागृत हिस्सा होता है मकान का ।यही नहीं वरन आंगन खुली धूप ,रोशनी और हवा का भी एक इंतजाम होता है । यह सब तो बस्ती के स्थापत्य का जरुरी हिस्सा बना हुआ है आंगन ।आज आधुनिकता की कालोनी टाईप बसाहट की डिजाइन ने। घरों को गुफा में बदल डाला है ।
बहुमंजिला इमारतों के चलन हों या फ्लेट सिस्टम हों , खेतों को परिवर्तित करके काटे गये भू – खण्ड हों ,इस तरह की बसाहट ने भी आंगन के महत्व को कम किया और धीरे – धीरे आदमी खुलेपन से दूर धूप ,हवा और रोशनी की कृत्रिम व्यवस्थाओं पर निर्भर होता गया ।नैसर्गिक संसाधन आदमी की पहुंच और और तकनीकी प्रभाव के कारण महत्वहीन हो गये ।आंगन मनुष्य के जीवन की जीवन्तता का सबसे बड़ा प्रमाण था । आज आदमी अपराध और आत्म रक्षा के भय से इतना ज्यादा हिला हुआ है कि वह अपने आसपास चार दीवारी का घेरा बनाता गया और अपराध को खतम करने की दिशा में विचार करने की बजाए अपने को कैद करता गया ।इस तरह आंगन का खुलापन मन की निर्भयता सबका विकल्प चुना फ्लेट ,बहुमंजिला इमारत ,ऊंची ऊंची चारदीवारी ।आंगन संवाद का एक सिलसिला है जो अड़ोस – पड़ोस के साथ भावनात्मक रिश्तों को संबंधों के सूत्र स्थापित करते थे ।संवाद बनाने और अजनबी पन को खतम करने का जरिया होता है आंगन ।संवाद की शुरुआत तो इतने से जुमले से भी हो जाती है —” आज बहुत गर्मी है या बहुत ठण्ड है ” ये जुमले धीरे- धीरे चौपाल की जमघट को बढ़ा देते हैं और घर के कितने ही जरुरी काम टल जाये पर ओटले की बतकही का सिलसिला छूटना नहीं चाहिए ।इस ओटले, चौपाल ,आंगन में घर – परिवार की बहुत बड़ी बड़ी समस्याओं का हल चुटकियों में निकल जाता है ।आंगन मन की सहजता का पर्याय होता है ।आदमी से आदमी के मेल – मिलाप का जरिया है ।आंगन घर का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जहां गम से लेकर खुशियों के हजारों पल बनते बिगड़ते गुजर जाते हैं फिर भी आंगन की रौनक और बैठक का सिलसिला टूटता नहीं है ।आज पाश्चात्य जीवन शैली और ब्रिटिश पध्दति से बसी कालोनी सिस्टम ने जिस तरह के दासत्व के आदर्श रचे हैं वह कुल मिलाकर आदमी के स्वार्थ,एकाकीपन ,धन लोलुपता के ही प्रमाण हैं । इनमें बसकर आदमी ने आदमी से दूरी बनाई और अपने आपको सभ्य मानकर वह अपने वर्ग ,अपने समाज अपने संबंधियों से कटा – कटा रहने लगा। यह सभ्य होने का ढोंग अपने आपको वैभव पूर्ण जीवन का पैमाना मानने लगा ।और अपने निकट संबंधियों को हिकारत से देखने लगा ।यही वजह रही कि धीरे – धीरे आंगन की अहमियत भी खतम हो गयी । पश्चिमी जीवन शैली ने आंगन की आत्मीयता को परायेपन में बदल दिया ।जिससे भारतीय संस्कृति की आत्मा में रचा बसा लोकजीवन उपेक्षित हुआ लोकगीत ,ढोलक की थाप सूनी हुई और बचपन की किलकारी चहक सब बहुमंजिला क्रांक्रीट के अरण्य में विलुप्त हो गयी ।आंगन नहीं तो शोक में डूबे रुदन के स्वर दिलों में करुणा नहीं जगा सके और खुशी की चहक सब के दिलों में बधाई के मौकों को उत्सव में ही बदल पाई ।यह है आंगन को तोड़कर बनाई गयी दुकानों की खामोशी में जीता मनुष्य ।आंगन है तो किस्से – कहानी है हंसी ठिठोली है ,अनुभव है ,वाकये हैं ,घटनाएं हैं ,फेकम फेंक है ,गप्प हैं ,सच है ,झूठ है रुकना है ,मनाना है ,मसले हैं ,सुलह और समझौते हैं ,सलाह- मश्विरा है । हजार रास्ते हैं जिन्दगी बसर करने के लेकिन जब ओटले चौपाल चबूतरे आंगन ही सूने हो गये तो आदमी आदमी से अपने आप कटने लगा तो फिर जिन्दगी खुद – ब- खुद दुरुह और मुश्किलों में फंसे गई है ।आंगन है तो जिन्दगी आसान है ।धरती से जुड़ी है जिन्दगी । 🙏 विनीता रघुवंशी

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