नाला —३ ********* ताजी ताजी कुनकुनी बूंदी- सा चासनी सहित जहां तहां छितर जाता नाला और रिसक कर गोल गोल लड्डू – सा कुण्ड में समा जाता चाहे चूरा हो …
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August 2025
नाला — २ ********* बांस वन के घोंसलों से मानों किसी गोरैया के पके अण्डे से निकलकर चेनुए – सा फुदक रहा नाला जिसे चुगाने दूर तक छिटक रही बाड़े …
सतपुड़ा की पसलियो से रिसता : धनपाड़ा का नाला ( नाला — १ ) पहाड़ों पठारों से होकर सिर पर समा– धान की पुटरिया लादे हाट को निकले आदिवासियों –सा …
इतना ही नहीं सोचा **************** जब देने ही निकले तो गालियां ही दी तुमने ! दुआएं भी तो दे सकते थे जबकि दोनों ही आवाज की बेटियां हैं !! इतना …
कविता होते हैं बच्चे ****************** फूल पत्ती पर लिखना है लिखना है तितली पे कविता नदी झरनों पर लिखना है लिखना है चिड़ियों पे कविता सूरज चांद तारों पर लिखना …
तवा ****** चूल्हे पर चढ़ते ही चमक उठती घर की आंखें तब मेरी तपस्वी देह से उठने लगती सौंधी बयार चित्तियां पड़ी रोटियों की फैल जाती पास पड़ोस मोहल्ले तक …
अब ये हाल हैं ************* कहां जा रहे हो बाबू ? माफ़ करना मैं कोई उपदेशक नहीं हूं फिर भी तुम्हारी ने देखकर पूछने का मन हो गया है पहले …
पृथ्वी के जन्म पर ************** पृथ्वी का जन्म हुआ तो पहले पहल चुम्बन को दौड़ आया सूरज हवा ने डाल दिये झूले डाल – डाल और इतने इतने गीत रचे …
