Home आज की कवितातवा-पकी फसल के बीच

तवा-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
तवा
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चूल्हे पर चढ़ते ही
चमक उठती घर की आंखें
तब मेरी तपस्वी देह से
उठने लगती सौंधी बयार
चित्तियां पड़ी रोटियों की
फैल जाती पास पड़ोस मोहल्ले तक
चौके की गमक
जो नाक के जरिये
जीभ पर मीठा स्वाद रचती
आंतों तक लहर लहर समा जाती
खिल खिल खुलती जाती
कोशिकाएं देर तक
मैं तवा हूं तवा
भूख के लिए एक तृप्त आश्वस्ति
कि रोते बिलखते बच्चे भी
मेरी धूनी तक आते आते
भले चंगे किलकारियां भरने लगते
सदियों से आबरु की तरह
मुझे ही सम्हालती हुई औरत
अन्नपूर्णा है आज तक
और मां है हर वक्त
आंच से नहलाती हुई मुझे ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के द्वारा छपने के लिए तैयार पांडुलिपि से उद्धृत की गई है ।यह संग्रह बोधि प्रकाशन से प्रकाशित है लेकिन इसमें बहुत सी कविताओं के पृष्ठ जोड़े ही नहीं गये ।यह त्रुटि जब कविताओं पर टिप्पणी लिखते वक्त मुझे उजागर हुई और मैंने पांडुलिपि में जब इन्हें खोजा तो मामला समझ आया ।किसी लेखक के द्वारा तैयार पांडुलिपि को देखना भी एक सबसे बड़ा अनुभव है ।खासकर आज के युवाओं को जो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर भरोसा करते हैं और अपने परिश्रम को साफ्टवेयर में सेव करके किस तरह बेफिक्र हो जाते हैं ।साफ्ट शेयर कभी भी धोखा दे सकता है । लेकिन पांडुलिपि में सुरक्षित सामग्री हर समय उपलब्ध रह सकती है ।
तवा घर – गृहस्थी में काम आने वाला बर्तन ही है । तवा जब चढ़ता है चूल्हे पर रोटियां सेंकने के लिए तो सचमुच वह पूरे संसार की भूख का इंतजाम होता पेट भरने के लिए ।तवे शक्लें और हुलिए भले ही अलग अलग हों लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ रोटियां सेंकने के लिए ही होता है ।जब यह घर में चूल्हे पर तपाया जाता है तो इस पर सिंकती रोटियों की महक दूर दूर तक जाकर पास पड़ोस की भी भूख को जगा देती है ।आंतें भूख से कुलबुलाने लगती है ।तवे पर सिंकती रोटियों की गंध बयार की तरह फ़ैल जाती है । घरों की गमक से मोहल्ले और आसपास के घरों में सौंधी सुगंध पसर जाती है ।जीभ पर रोटियों का मीठा स्वाद महसूस होने लगता है ।दूर से आती रोटियों की सौंधी गंध कोशिकाओं को भी खोल देते हैं । तवा भूख की आश्वस्ति है । आज वर्तमान में यह सौंधी महक घरों से उठना बंद सी हो गई है क्योंकि आज “खाना आर्डर ” करने का चलन बढ़ गया है और चूल्हों पर तवा कम चढ़ने लगा है ।यह भूख की तृप्त आश्वस्ति होते हुए भी उपयोग का घटना चिन्ता की बात है । युवतियां अब तवा से दूर भागने लगी है ।तवा एक नदी का नाम भी है जो सतपुड़ा के अंचलो में नागपुर से इटारसी तक बहती है ।फिर नर्मदा से मिल जाती है ।तवा है तो फसलें हैं । जिन बच्चों को भूख नहीं लगती तो उनको तवा पर रख कर धूनी दी जाती है और रोता बच्चा तवा की धूनी से किलकारियां भरने लगता है ।यही तो तवा का चमत्कार हैं कि तवा की धूनी की महक से बच्चों की भूख भी खुल जाती है ।तवा घर की समृध्दि का लेखा जोखा है ।तवा उसी घर में चढ़ेगा जिस घर में राशन ,रोजगार ,और आजीविका की ,कमाई का साधन होगा ।गरीब की झोपड़ी से लेकर अमीर के भवनों तक में तवा की मौजूदगी पाई जाती है ।बिना तवा के रोटी सेंकने की कोई बात बन नहीं पाती । इसलिए तवा बहुत मामूली वस्तु होते हुए भी बहुत ही महत्वपूर्ण वस्तु है ।तवा मिट्टी का भी होता है,लोहे का तवा ,जस्ते का तवा और एल्यूमीनियम का तवा ,और आज आधुनिकता ने बहुत सी धातुओं के तवे भी निर्मित किये हैं ।तवा वहीं सुकून भरा होता है जो घर भर की भूख के लिए चूल्हे का ताप सहता है । इसीलिए तवा तपस्वी है ।वह ताप सहन करता है सबके लिए हित के लिए । इसीलिए घर भर में यदि शगुन स्वरुप कुछ अच्छा – भला है तो तवा ही है । सदियों से औरत ने तवा को बहुत साफ – सुथरा रखा है तो वह तवा ही है ।तवा है तो औरत अन्नपूर्णा है ।तवा है तो औरत मां है । हर वक्त वह भूख का समाधान रचती है तवा के साथ ।जब जब तवा तपता है तो औरत मां बन जाती है ।स्त्री के भांति भांति के रुप निखरने लगते हैं तवा की तपन के साथ ।जब तक तवा रहेगा तब तक स्त्री मां और अन्नपूर्णा बनी रहेगी । तवा औरत की आबरु और सम्मान है ।पालन पोषण की गरिमा है । तवा होना गंभीर और गहरा होना है ।तप वहीं सकता है जो सबका भला चाहता हो ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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