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अब ये हाल हैं-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
अब ये हाल हैं
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कहां जा रहे हो बाबू ?
माफ़ करना मैं कोई
उपदेशक नहीं हूं
फिर भी तुम्हारी ने देखकर
पूछने का मन हो गया है
पहले पहल मैं भी
चाहे जहां चल दिया करता था मुंह उठाये
पहले पहल मैं भी
तुम्हारी ही तरह
महिनों तक हंसाता ही नहीं था बाबू !
अब ये हाल है कि
मेरी आंखें तक हंसती हैं
और पांव तक पहचान लेते सफर
अब ये हाल है कि सुन लिया करता
कोसों दूर से आती मेमनों की गुहार
और भेड़ियों की गुरगुरी
अब ये हाल है कि
दोस्त और दुश्मनों के घरों को
ठीक से पहचान लेती हैं
हाथ मिलाते ही मेरी हथेलियां
अब ये हाल है कि मैं
चुस्त चौकन्ना निकलता हूं घर से
अब ये हाल है बाबू
कि मेरी मुट्ठियों में हर वक्त
एक न एक शानदार सपना होता है
जिसका जादू मुझमें
चलने ही चलने का विश्वास बोता है
अब ये हाल है बाबू कि मैं
इन्हीं के साथ रहता हूं
और तुम्हें भी किसी न किसी
अच्छे सपने को सहेज लेने का आग्रह करता हूं
इसलिए कि बेमतलब दौड़ने वाला
अश्व मेघ का घोड़ा भी
फुर्री करके बैठ जाता है कहीं भी ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” पकी फसल के बीच” से उद्धृत )
आदमी के जीवन में कोई न कोई उद्देश्य होना चाहिए ।जिन्दगी को व्यतीत करने का कोई अच्छा विचार होना चाहिए ।यों तो हर आदमी जिसने भी इस पृथ्वी पर जन्म लिया है वह समय अनुसार बचपन ,जवानी ,प्रौढ़ अवस्था ,और बुजुर्ग अवस्था और अन्तोगत्वा मृत्यु तक का सफर तो सुनिश्चित ही है ।इस तरह के जीवन में और जन्म से लेकर मृत्यु तक पहुंचने में कोई नवीनता या कोई नवाचार तो है ही नहीं ? सब जन्म लेते हैं और आजीविका भी अर्जित करते हैं ।उसके लिए कर्म भी करते हैं और धन सम्पदा जोड़ कर एक धरोहर ,एक विरासत, एक सम्पत्ति का सृजन कर लेते हैं ।यह हर प्राणी करता है और हर प्राणी के जीवन का आकर्षण भी यही है । अकूत धनार्जन ? लेकिन यह सम्पदा का अर्जन कोई महत्वपूर्ण विचार नहीं है ? जब तब बिना विचार के जीवन व्यतीत कर देने के भी कोई गंभीर और गहरे मायने नहीं होते ।इस तरह धनार्जन करके सम्पत्ति जोड़ने वालों का उपयोग धन करता है ।वे धन का उपयोग और समय का उपयोग करना नहीं जानते । हर समय धनार्जन की चिन्ता में डूबा मनुष्य समय का भी सही सामाजिक उपयोग नहीं कर पाता ।न ही वह ज्ञान का अर्जन करता है न अपने अस्तित्व का ही सदुपयोग समाज हित में ही कर पाता है ।उसके पास समाज सृजन के सपने भी नहीं होते ।वह हर समय यथास्थिति में ही अपना जीवन व्यतीत करता है । वह न तो परिवार के बदलाव के प्रति सपने संजोता है नगर ,गांव, महानगर ,शहर न समाज के बदलाव के लिए ,और न ही वह राष्ट्र के बदलाव के लिए अपने मन में कोई सपनों या विचारों को सहेजता है । वह केवल अपनी यथास्थिति में जकड़ा रहता है । किसी भी मनुष्य का विचार शून्य जीवन बेमायने और अर्थहीन ही होता है । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके जीवन की सार्थकता समाज में ही प्रकट होती है । मनुष्य के जीवन में जिस तरह उदासी का मतलब है , रुदन का मतलब है गंभीरता का मतलब है ,उसी तरह उसके जीवन में हंसने का भी मतलब है ।हंसी तब ही आयेगी जब वह अपनी चेतना को समाज के साथ साझा करेगा ।उसकी चेतना में समाज के लिए सपने होंगे ।समाज की बेहतरी के सपने ,समाज की शिक्षा के लिए सपने ,समाज की सेहत के लिए सपने , समाज के वैचारिक बदलाव के सपने , यही सब तो है सपनों को ढालने की बुनियाद । जहां समाज सृजन के विचार सफर के लिए तैयार हों । समाज के हर व्यक्ति के पांव यह जान लें कि समाज सृजन की दिशा किस तरफ है । समाज के उन्नयन के सपने ही वास्तविक विचार हैं ।समाज को उदार मानवीयता के वैचारिक रूप से दिशा और दशा देना ही जब मकसद होगा तब ही तो समाज में करुणा का विस्तार होगा । भेड़ियों और मेमनों की पहचान होगी ।समाज का हित वास्तव में कहां है और कौन सा विचार समाज को हानि पहुंचाने वाला है यह भी बहुत मायने रखता है ।यह चेतना ही तो है जो समाज की दूरदृष्टि का ठोस आधार बनती है ।समाज के हित दूरदृष्टि से लिए गये निर्णयों में ही स्थित होते हैं ।हाथ मिलाते वक्त ही हमें अपने दोस्त और दुश्मन का स्पर्श समझ आना चाहिए ।यह समाज नीति भी है और राष्ट्र नीति भी है । सपनों का शानदार अस्तित्व ही मनुष्य को गति प्रदान करता है । मनुष्य की चेतना में पला हुआ सपना उसके जीने की चाह को बढ़ा देता है । हर मनुष्य के पास एक चेतना सम्पन्न सपना होना चाहिए ।अन्यथा अश्वमेघ के लिए छोड़े गये घोड़े भी समय आने पर शिथिल हो जाते हैं और चाहे जहां तक कर बैठ जाते हैं ।हमेशा यात्रा का उद्देश्य होना चाहिए ।विचार पूर्वक की गई यात्रा हमेशा गति को उत्साह देती है । यदि उद्देश्य किसी अन्य का हो और यात्रा पर कोई और निकले तो उसमें उत्साह ,उमंग ,और जोश नहीं रहता ।ऐसी यात्राएं भले राजनीतिक ही क्यों न हो वे थके हुए अश्व की यात्रा ही होती हैं । यात्राओं में उद्देश्य और विचार अवश्य होना चाहिए । यात्रा चाहे मनुष्य की हो ,परिवार की हो ,समाज की हो या राष्ट्र की हो सब के गतिशील होने में विचार का होना बहुत मायने रखता है । व्यक्ति को भी अपनी जीवन यात्रा का उद्देश्य और विचार अवश्य तय कर लेना चाहिए । निरुद्देश्य यात्रा की सफलता या असफलता की कोई गरिमा नहीं रहती ।वह निर्थरक ही होती है ।जैसे राजनेताओं के विदेश भ्रमण पर की गई आर्थिक बर्बादी । यह समाज हित और राष्ट्रीय हित में नुकसान दायक है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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