10
कविता होते हैं बच्चे
******************
फूल पत्ती पर लिखना है
लिखना है तितली पे कविता
नदी झरनों पर लिखना है
लिखना है चिड़ियों पे कविता
सूरज चांद तारों पर लिखना है
लिखना है अमराई पे कविता
सम्बन्धों के गर्व पर लिखना है
लिखना है ऋतुओं के पर्व पे कविता
रात भर करवटें बदलता
ऐसे ऐसे विषयों पर सोचता रहा कवि
और भोर के साथ ही
फूल पत्ती से महकते
चिड़ियों से चहकते
नदी झरनों प्रपातों से खिलखिलाते
घर आंगन तितली तितली
फुदक उठे हैं बच्चे
सूरज के साथ दातून करते
सुना रहे बच्चे आपस में सपने
कि जिनमें उन्होंने अपने अपने
जंगल पहाड़ मैदान तक
खेल खेल में
कितना छकाया
चांद तारों को रातभर
कितनी कितनी किलकारियां बिछाई
गांव से अमराई तक
कि जिनके साथ
लह लह झूम उठीं फसलें
कि जिनके साथ थिरक उठी —
दिशा दिशा ऋतु गंध
कि जिनके साथ द्वार द्वार झूल उठे
सम्बन्धों की झालरें झूलते वत्सल छंद
अपने आपमें साक्षात सुलझी हुई
कविता होते हैं बच्चे
और विषयों की टोह में करवटें लेता
साक्षात उलझा होता है कवि ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह की पांडुलिपि —” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
बचपन इतना मासूम होता है कि उसे बतियाने के लिए किसी विषय की तलाश नहीं करना पड़ती है । बच्चे अपने भोलेपन में सबको मोहित करते हैं ।एक प्रसंग महाकवि सूरदास जी का स्वत: स्मरण हो आया ।जब गोपियां नन्हें बाल गोपाल श्री कृष्ण से रसभरी तोतली आवाज में बतियाने के लिए उनकी बांसुरी को लुका लेती हैं । जब भी श्री कृष्ण गोपियों से बांसुरी मांगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं कि हमारे पास नहीं है तुम्हारी मुरली ।जब श्री कृष्ण देने को कहते हैं तो आंखों ही आंखों में मुस्कुराती हैं और नट जाती हैं याने मना कर देती है — बतरस लालच लाल की मुरली लई लुकाई , देन कहे सो नटी नटी जाई ,सौह धरे ,नैनन रहे मुसकाई ” ।
यह है मासूमियत भरी बातचीत का रस ।बचपन में बच्चों का मन निर्विकार रहता है । न वे द्वेष जानते हैं न ईर्ष्या जानते हैं। न वे लालची होते हैं न उन्हें लोभ ही घेरे रहता है ,क्रोध और झगड़ा भी उनके मन को मैला नहीं कर पाता । उन्हें बात करने के लिए किसी विषय की भी जरुरत नहीं होती ।उनके पास तो बस होती है जिज्ञासाएं ।यह कैसे हो गया ? ये कहां से आ गया ? ये कैसे बनता है ? ऐसा क्यों होता है ? ऐसे ही ढेर सारे सवाल जिनमें सिर्फ जानने का कौतूहल होता है । सीखने की ललक होती है । होता है नकल करने का उत्साह । बड़ों की नकल ,बड़ों के समान बनने की शीघ्रता । उनके मन में आलस्य नहीं होता उनकी दुनिया सूरज के निकलते ही शुरु हो जाती है दिन भर तरह तरह की बातों से मन बहलता रहता है और रात होने पर वे आराम से भरी नींद में सपनों को सजाते हैं ।वे फसलें बोते हैं ,चांद तारों को छकाते हैं और सुबह अपने बाल सखाओं को खूब सारी बातें करके हंसते – मुस्कुराते हैं ।बचपन में वे चहकते हैं महकते हैं प्रपातों से खिलखिलाते हैं । उन्हें बात ,संवाद बनाने के लिये वयस्कों और प्रौढ़ों की तरह विषय नहीं तलाशने पड़ते ।जब कि कवि मन कविता करने के लिए सायास विषय तलाशने की उलझन में उलझे रहते हैं । दुनिया से संवाद करना ,बात साधना कितना कितना मुश्किल काम है जिसमें कवि मन निरंतर करवटें बदल बदल कर सोचता है और दूसरी तरफ़ बच्चों का सहज मन है जो कहीं से भी अपनी बात शुरु कर देता है ।यह सहज मन और असहज मन के बीच का अन्तर है ।जो मन सहज और सरल है वहां संसार भर की बात संसार भर से की जा सकती है । वहां बहुत से किस्से कहानियां और कल्पनाएं हैं लेकिन जो असहज और चेतना की सरलता से दूर है उसके मन में बहुत सी उलझनें बरकरार रहती है । इसलिए मनुष्य को विकारों ,विषादों और द्वेष पूर्ण विचारों से विलग रहना चाहिए ।मन की सहजता और विकार विहीन विचार ही मनुष्य को निष्कपट संसार रचने में मदद कर सकते हैं । कविता जितनी सहज होती है उतने ही बच्चे भी सहज ,सरल होते हैं । बच्चों को देखना , बच्चों के साथ समय बिताना , बच्चों से निश्च्छलता का आनंद पाना , जीवन रस की प्राप्ति ही है । सचमुच बच्चे स्वयंमेव सुलझी हुई कविता होते हैं । आधुनिक संसाधनों ने आजकल बच्चों को एक कमरे में कैद कर दिया है और इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों ने उनकी कल्पनाशीलता को आघात पहुंचाया है ।यह बात पालकों को बहुत गहराई से समझना चाहिए कि वे अपने मासूमों के साथ क्या घोर अन्याय कर रहे हैं ।
विनीता रघुवंशी
