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January 2024

जब भी याद करता नर्मदा को ************************ मैंने तो मकर संक्रांति की शीतलहर में ठंड से कांपती नर्मदा को कुनकुनी रेत के अलावा पर बदन सेंकते देखा है घाट -घाट …

सिरे तक ******* प्यार उस खरगोश की तरह है जो एक सिरे से बिल बनाता दूसरे सिरे तक निकल जाता जहां उसी का इंतजार करती घृणा हर बार खड़ी मिलती …

हँसी के आँसू *********** हँसी के आँसू देखे हैं ? वे रुदन के आँसुओं जैसे नहीं होते ना उतने गरम ना उतने तरल ना ही समाया रहता सागर भर नमक …

प्रेमशंकर रघुवंशी जी के जन्मदिवस पर एक विशेष कविता पुण्य स्मरण के साथ समर्पित उम्र के वृक्ष पर ************* भरपूर जीकर उम्र के वृक्ष पर निशान छोड़ झरने ही वाला …

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