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जब भी याद करता नर्मदा को
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मैंने तो
मकर संक्रांति की शीतलहर में
ठंड से कांपती नर्मदा को
कुनकुनी रेत के अलावा पर
बदन सेंकते देखा है घाट -घाट
बांटते देखा है दिनभर
गुड़ तिल्ली का प्रसाद
रोते भी देखा था उस वक्त
जब सावन की मूसलाधार झरी में
गांव के गांव बहे थे गोद से उसकी
रखवाली करते तो
पिछली गरमी में ही देखा था उसे
जब नहाते वक्त
मेरे कपड़ों – लत्तों – सामान के पास
बैठी रही थी पेढ़ियों पर चौकन्ना
और उस दिन तो /आंगन तक —–
छोड़ने भी आई थी मुझे
जब मां का अंतिम संस्कार कर
लौट रहा था घर
अब तो ये हाल है कि
जब भी याद करता नर्मदा को
वह मेरे करीब होती है
या मैं उसके
बल्कि नर्मदाकार ही होते हैं
एक साथ हम ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में नर्मदा नदी के समान अपने को विस्तृत कर लेना और नर्मदा ही नही वरन हर उस जलधारा के जनहित कारी रुप ,गुण को आत्म सात कर लेना।उन तटवासियों के दुःख -दर्द , संवेदना ,आस्था , सब को अपने भीतर समेट लेना ही नर्मदा होने का भाव है ।नर्मदा के ओर -छोर पर बसे तटवासियों की स्वाभाविक सादगी ,सहजता और समर्पण का भाव पूरी तरह अपने भीतर महसूस कर लेना भी तो नर्मदा हो जाना है ।नर्मदा की बहती धार के समान संवेदना ,करुणा की तरल धार की अनुभूति ही तो नर्मदा होना है ।जब भी नर्मदा नदी नहीं मनुष्य की भावनात्मक लगाव की तरलता के साथ संग संग चलती प्रतीत होती है और आदमी की अन्तर अनुभूति स्वत: उदार हो जाती है तब तब आदमी सहृदय बन नर्मदा का आकार ग्रहण कर लेता है । नर्मदा में स्नान कर अपने पाप -पुण्य का हिसाब- किताब करना एक बात है लेकिन नर्मदा के आत्म रुप को धारण कर लेना एक सात्विक अनुभव है । यह अनुभव और अनुभूति जितनी ही गहरी होगी उतना उतना ही मनुष्य साधक के उच्च स्तर पर पहुंचता जाता है । क्या आज भी हम प्रकृति के उन स्वरुपों -पेड़ पौधे,नदी -नद,पहाड़ -पर्वत , समुद्र -कंदरा , के साथ आत्मिक रिश्ता महसूस कर पाते हैं या वे केवल हमारे भौतिक लाभ पहुचाने वाले संसाधन ही है और हम नितान्त उनके उपभोक्ता , और हमारे लिए ये उपभोग की सामग्री भर हैं ।प्रकृति के ये उपादान मनुष्य को संरक्षण देते ये रुप आज भी मनुष्य की संवेदना पूर्ण दृष्टि की दरकार रखते हैं । आदमी बस आधुनिक होकर इन प्राकृतिक उपादानों के प्रति निष्ठुर भोक्ता की स्थिति में दोहन कर्ता बना हुआ है परन्तु उसकी यह अवस्था चिन्तनीय है ।यह मनुष्य के विनाश का मार्ग है । यदि मनुष्य को अपना विनाश रोकना है तो उसे प्रकृति के साथ इसी तरह के भावनात्मक सहानुभाव से जुड़ना होगा। प्रकृति को अपने सुख -दुख में संग साथ अनुभूत करना होगा ।यह एकाकार होती मनःस्थिति ही मनुष्य के आधुनिकता से उपजे तनाव ,कुण्ठा , ग्रंथियों, अकेलेपन से मुक्ति दिलायेगी । कविता में नर्मदा का मानवीयकरण और संवेदनाशीलता स्तुत्य है ।क्या आज का मनुष्य प्रकृति के भौगोलिक उपादानों से इसी तरह का तादात्म्य स्थापित कर सकेगा ।नर्मदा और पृथ्वी पर जल स्रोत की तरह हर भूसंरचना के प्रति मनुष्य सदाशयी हो पायेगा ।यदि हमारी विचार और धारणा में नर्मदा मां के भाव रुप में है तो उसका आचमन ,दोहन ,भोग भी संयम और सम्मान से होना चाहिए ।नर्मदा मन,आत्मा में बस कर जब एकाकार हो जायेगी तब ही नर्मदा नदी नही आत्मरुप बन जायेगी । मनुष्य कभी भी अपने आप पर अन्याय सहन नहीं कर सकता तो नर्मदा पर कैसे करेगा ।यह भाव रुप एकाकार की स्थिति है ।सचमुच प्रकृति मनुष्य का आत्मरुप ही है मनुष्य भी पंच तत्व से बना है और यह भूमंडल , भौगोलिक क्षेत्र भी पंच तत्व का ही पुंजीभूत स्वरुप है। आत्मरुप नर्मदा हमारे संग साथ रहेगी ।
विनीता रघुवंशी
