बे मौसम बरसात *************** नदी की धार के नीचे चमकती बालू जितनी सुहानी लगती उतनी ही बुरी लगती घरों में घुसती रेत चूल्हे या अलाव की आग जितनी सुहानी लगती …
कविता
नदी -4 ******** फिर बोली नदी — मैं अब बारहों महीने बीमार हूँ मत छुओ ,छुओ मत मेरे गर्भ में फैक्टरियों का तेजाब पल रहा है मेरी इस हालत के …
नदी -3 ******* बोली नदी — कोई न कोई लड़की जब -तब डूब जाती मेरे भीतर अंधेरे में सूरज का अहसास खोकर सुबह वह एक चर्चा बनती फूल कर तैरती …
यहाँ जमीन पर कविता संग्रह – पहाड़ों के बीच (Pahadon Ke Beech) रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. ओ, सदियों से सोई घाटियों! तुम्हारे ऊपर पत्थरों की स्याह इबारतों में जो लिखा …
पिता कविता संग्रह – पहाड़ों के बीच (Pahadon Ke Beech) रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. चाहे जितना सर्द गर्म हो मौसम पिता भोर के पहले उठ आते नहा धोकर रोज रोज …
देखा, बिना नाम के तुम्हें देखा, बिना नाम के तुम्हें तो, सही दिखायी दीं तुम। खुद को भी इसी तरह देखा तो सही -सही देख लिया खुद को । अब, …
लहूलुहान है नदी ! कविता संग्रह (Nahi Rahne Ke Baad Bhi) नहीं रहने के बाद भी रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. गटरों के तेज़ाब से आहत छाले पड़ी देह पर बेशररम …
सिल देना चाहती हैं नदियाँ ———————————- कितने भले रहे होंगे वे जिन्होंने रची होगी नदियाँ पाला, पोसा ,बड़ा किया होगा रचे होंगे – तीज -त्यौहार -उत्सव -मेले और कितने बुरे …
