आज की कवितापिता – पहाड़ों के बीच by Dr. Vinita Raghuvanshi 10/09/2020 written by Dr. Vinita Raghuvanshi 10/09/202010पिताकविता संग्रह – पहाड़ों के बीच (Pahadon Ke Beech) रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी.चाहे जितना सर्द गर्म हो मौसमपिता भोर के पहले उठ आतेनहा धोकर रोज रोज नहलातेघाटी से उगते सूरज को —-चमचमाते कलश सेमुझे पिता का कलश हमेशा हमेशासूरज से ज्यादा चमकदार लगताजाने कितने रोगों से ग्रस्त मेरे बूढ़े पिताआज भी सूरज से ज्यादा जवान हैंआज भी उससे पहले उठते हैंकाम पर पहुँचते हैंऔर सूर्यास्त के बाद जब लौटते हैंतो आज भी घर -आँगनएक नये सूरज की रोशनी से भर जाता हैमेरे बूढ़े पिता आज भीसूरज से ज्यादा प्रकाशवान हैरोशनी के पहाड़ की तरह!कविता संग्रह – पहाड़ों के बीच (Pahadon Ke Beech) रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. kavitapahadon ke beechकवितापहाड़ों के बीच 0 comments 0 FacebookTwitterPinterestEmail Dr. Vinita Raghuvanshi previous post यहाँ जमीन पर – पहाड़ों के बीच next post देखा, बिना नाम के तुम्हें You may also like नाले का जनेऊ पहने पहाड़-पकी फसल के बीच 31/08/2025 वो देखो !-पकी फसल के बीच 30/08/2025 अभी अभी नाले में हिरनियां-पकी फसल के बीच 29/08/2025 लोकगीतों की तरह-पकी फसल के बीच 28/08/2025 नाले में जो बह रहा-पकी फसल के बीच 27/08/2025 सप्तपदी की श्वेत जटाओं से-पकी फसल के बीच 26/08/2025 सुबह भाप छोड़ता-पकी फसल के बीच 24/08/2025 पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता-पकी फसल के... 23/08/2025 ताजी ताजी-पकी फसल के बीच 22/08/2025 बांस वन के घोंसलों से-पकी फसल के बीच 21/08/2025Leave a Comment Cancel ReplyYou must be logged in to post a comment.