गटरों के तेज़ाब से आहत
छाले पड़ी देह पर
बेशररम की झाड़ियाँ उगाए
लहूलुहान है नदी
तटों में दम नहीं कि
एड़ियाँ घिसने के पत्थर ही बचा लें
बचा लें बच्चों के घरघूले
जड़ें सभ्यता संस्कृति की
सन्नाटे की टिकटी पर
मकड़जाल से जकड़ी
आकाश ताकती
संज्ञाशून्य है नदी!!