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May 2021

विजय ****** पाँव मेरे बहुत जिद्दी हो गये हैं इन्हें चलने के अलावा सूझता कुछ भी नहीं और तेरा शुक्रिया कर लूँ कि तूने व्यथाएँ इतनी बिछा दी राह पर …

कुछ वैसा ही *********** लिख लिखकर मैं होता प्रसन्न पढ़कर बतलाता बार बार ! ! सूरज लिखता ज्यों ज्योतिपत्र लिखता चंदा ज्यों धवल प्यार तारे लिखते ज्यों नभ गंगा बादल …

बोलो अब ********** एक साँस ठण्डी है एक गरम बोलो अब क्या करें हम ? एक तरफ सूरज है चाँद एक ओर आसपास बेईमान बीच बडे़ चोर पहले पर रिश्वतिया …

जीवन ****** तमाम पंखुरियाँ झर जाने के बाद सुगंध का अहसास फिर भी रहेगा घर-घर , वन -वन झर रहा गुलाब -सा जीवन ।। (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के गीत …

तुम्हीं बताओ *********** तेरा उजडा़ चमन मेरा धूल भरा आँगन तुम्हीं बताओ इस मौसम में कौन बहारें लायेगा तोरण कौन सजायेगा ! ! होती यदि रोशनी संतुलित सारे आँगन जगमग …

मत करो ******** मोड़ चाहे सफर के हों या सड़क के -भले लगते हैं गुजर करके सुरंगों से आ रहे वे लोग हो चुका जिनके जेहन में आत्मघाती रोग जहाँ …

भोर भयी,अलसाये स्वप्न सब बिसार दे छितराये बालों को फिर से सम्हाल ले देख तेरे द्वारे पे ज्योति पुंज आये हैं ! बीती है अन्ध निशा पुलकित है दिशा -दिशा …

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