Home Archives
Monthly Archives

April 2021

प्रेम -1 ***** नहीं होती कोई गली पगडण्डी या कि सड़क तो भी आऊँगा मुक्ताकाश पर रचते हुए इन्द्रधनुष । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” तुम पूरी …

तवा ***** चूल्हे पर चढ़ते ही चमक उठती घर भर की आँखें तब मेरी तपस्वी देह से उठने लगती सौंधी बयार चित्तियाँ पडी़ रोटियों की फैल जाती पास पडो़स मुहल्ले …

खिलखिलाती नदी **************** चिन्ता में डूबी नदी सूखकर काँटा होती चिढ़चिढी़ होते ही रुक जाती धार और क्रोध से बन जाती रेत ओ ! मेरे गाँव की नदी हँसती रह …

निठल्ली नहीं बैठती तुम्हारी दिल्ली *********** सुना है रस्म अदायगी में माहिर है तुम्हारी दिल्ली वह जितनी तन्मयता से राजघाट पर श्रध्दार्पण करने वालों के साथ ईश्वर अल्ला तेरे नाम …

गालियाँ जब भी ************** गालियाँ जब भी भूगोल की सरहदें पार करतीं पहले पहल इतिहास ही घायल होता हर बार झुलसता उसका ही चेहरा । राजनीति के फरेब रचती गालियाँ …

डूबकर डूबा नही हरसूद ******************** (लम्बी कविता का अंश ) इसी नर्मदा की पावन देही की शल्य क्रिया कर वास्तुविदों संग तुमने ऊँचा बाँँध बनाया और छीन ली रेवा उन …

नामुमकिन ********* नहीं पढी़ होती हयग्रीव की कथा तो मैं भी तुम्हारे द्वारा लगातार परोसी गालियाँ खाते हुए लगातार मुस्कुराता नहीं वत्स ! वेदों को चुराने तक तो क्षम्य था …

कहाँ तक बहेगी नदी ***************** नदी किनारे — रेत पर घरघूले बनाते बच्चे नन्हीं इच्छाएँ लिए गृह निर्माण की कलाएँ सीख लेते सीख लेते किलों की रचना और यह भी …

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More