प्रेम -9 ****** यदि तुम अपनी गंध , दमक,सिहरन,स्वर और उष्मा नहीं बोती तो ये जमीन कहीं की भी नहीं होती । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” …
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April 2021
प्रेम -8 ******* कितना धुला -धुला है पठार हाथ हिला -हिला कर टेर रहा लगातार सुनो और देखो उधर । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” तुम पूरी …
प्रेम -7 ****** छितराने लगे मेघ और शरद की धूप कालने लगी ऊन आकाश में खुलकर (प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से …
प्रेम -6 ****** ओफ! कितना कीचड़ यहाँ अब हम अपने खून पसीने से उगायें कमल । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह “ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” …
प्रेम -5 ******* शहर में लगी धारा के बावजूद बहती एक धारा मेरे भीतर कल कल – – – – जिसमें नहाकर तनी बन्दूकों के बीच से आ ही गया …
प्रेम -4 ******* जब नहीं होती पास तो होती एक कविता ठीक तुम्हारी तरह होने पर होती तुम एक कविता कविता की तरह । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
प्रेम -3 ******* तुमने देखा और मैं आकाश हो गया एक दम तना हुआ । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह “तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत …
प्रेम-2 ******* ओठों से फूट पडा़ झरना पपीहरा पा गया तृप्ति । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह “तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
