जाल्पा की घाटी ************* एक गर्भवती की तरह कराह रही हो तुम किसी शिशु को जन्म क्यों नहीं देती ? बांझ हवाएं तुम्हारी छाती पर कब तक करती रहेंगी धींगा …
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February 2024
मिलावट ******** हां की पोटली खोली तो उसमें थोड़ी- सी ना भी निकली ना में इसी तरह पाई थोड़ी – सी हां अब कैसे विश्वास किया जाये कि अपने पास …
चाणक्य से ***** **** शिखा पर गांठें बांधने वाले तुम्हारे प्रतिज्ञा भाव को तुम्हारे ही चेले घाटियों ने उस्तरों की परम्परा में बदल कर रख दिया है और अब कु-शासन …
बोध ***** चट्टानों ! तुम्हारी नींद में जितनी प्रगाढ़ता है उतनी ही तन कर खड़े होने की दृढ़ता भी है तुममें ! ! ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
नदी का खून *********** इन्हीं पत्थरों से निकालनी चाही थी एक नदी जिसे तुम्हारे घर के अंगारे से उस कमरे तक जाना था जहां बैठकर तुम रेगिस्तान के अहसास में …
आत्मा की देह हैं चीजें ******************* इतनी सगी होती चीजें कि छूट जाने पर टूट जाते लोग मरने के बाद भी जीवित रखती चीजें पुरातत्व की तरह सदैव चीजों की …
