दंगा : ग्यारह कविताएं ****************** (१) बहन की शादी को लड़का देखते वक्त कहां था मां ने —- उजड़ते गांव में मत देना बेटी तब आबाद गांव में बियाही थी …
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August 2024
परचन पाल के शिल्पी ****************** शिल्पग्राम परचनपाल जहां जीवित परिवार की तरह रहते जगदलपुर के शिल्पी जिनकी अपनी झोपड़ी अपनी तुरही अपने देवी – देवता अपनी पूजा है अपनी दाल …
ग्रहण की चिन्ता किए बगैर ********************** एक सूरज भाल पर एक इरादों में एक पेट में भाल का सूरज मां ने रचा इरादों का मैंने पेट का भूख ने भाल …
नई सहस्राब्दी में ************** सम्हालकर रखी है मुंडेर पर थोड़ी सी निर्मल धूप थोड़ी सी चांदनी बादल और भूगर्भ में जल समुद्र तल में जलचरों के अंडे पर्वत चोटियों पर …
रहने लायक है दुनिया ****************** अभी इतनी खराब नहीं हुई दुनिया कि रहा ही नहीं जाए इस पर ऐसा कभी होगा भी नहीं अभी तो — झाड़ुएं बनाने और बुहारने …
कवि की खोज में भटकती कविता **************************** (अरुण कमल के लिए ) आश्वस्त होना चाहती कि मुझे — कुछ दूर ही सही जिंदगी के पास तो ले चलोगे कवि आश्वस्त …
खुद तय करता पानी ***************** जलाशयों की गहराई और प्रपात रचता अपना मार्ग खुद तय करता पानी जमीन के अंदर और आसमान में बादलों से अपना प्रवाह खुद तय करता …
कहां गए नीलकंठ ************** पहले पहल जब सुनी थी छत पर किर्र किर्र की आवाज तो मैं दौड़कर पहुंचा था वहां जहां तुम थे नीलकंठ तब मैंने चौड़े तबले में …
