ऐसे में कैसे ********* ऊँट चाहे जिस करवट बैठे रेगिस्तान में अच्छा लगता है जहाँ वह कररवटें बदल -बदल कर रेत के पहाडो़ से खुद को और दूसरों को बचाता …
तुम पूरी पृथ्वी हो कविता
हमें ही परचानी होगी आग ********************** लोग हैं कि कानून बना मिटा रहे लोग हैं कि रेलों -बसों-यानों में आ -जा रहे लोग हैं कि कोठियों सहित नम्बर दो हुए …
अरदास करते वक्त **************** देवालय में घुस आया दैत्य पूजा के शब्दोच्चार में निखर रहा जिस का रुप जय -जय कार के बीच घूरता युवतियों को अपने साम्राज्य की चीजों …
प्रेम -9 ****** यदि तुम अपनी गंध , दमक,सिहरन,स्वर और उष्मा नहीं बोती तो ये जमीन कहीं की भी नहीं होती । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” …
प्रेम -8 ******* कितना धुला -धुला है पठार हाथ हिला -हिला कर टेर रहा लगातार सुनो और देखो उधर । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” तुम पूरी …
प्रेम -7 ****** छितराने लगे मेघ और शरद की धूप कालने लगी ऊन आकाश में खुलकर (प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से …
प्रेम -6 ****** ओफ! कितना कीचड़ यहाँ अब हम अपने खून पसीने से उगायें कमल । (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह “ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” …
प्रेम -5 ******* शहर में लगी धारा के बावजूद बहती एक धारा मेरे भीतर कल कल – – – – जिसमें नहाकर तनी बन्दूकों के बीच से आ ही गया …
