जवाब ****** तुमने पहाड़ से उसका संकल्प पूछा नदी से क्यों नहीं इसलिए कि वह तुम्हारी बात कल पर टालते ,कन्धें उचकाती लटें छिटकाती ,बलखाती ,खिलखिलाती सागर की तरफ बढ़ …
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November 2024
पलीते लगाते हाथ ************** * सुरंगों ने फिर से खोल दिये हैं अपने मुंह अजगरों की तरह लपलपा रहीं हैं वे जीभें बाहर मैदानों में बढ़ रही हैं जहरीली साजिशें …
खुली धूप में *********** बहुत जरुरी है कि साफ सुथरी जिन्दगी के लिए कीचड़ में धंसकर भी कमल की जड़ों तक पहुंचा जाए कलफ हो या छापा या दर्जी के …
आंच पर सोचते हुए **************** जब लगी हो आग तब जस का तस पड़ा रह जाता सब कुछ और हम किसी की कुछ भी परवाह किए बगैर आ जाते बाहर …
लगातार ******** भावुकता कोई रस्सी नहीं कि जिसमें बांध कर चाहे जिसे ले जाओ घर या चाहे जिसके गले में डालकर फंदे लटका दो पेड़ पर वह तो एक नदी …
चहलकदमी ********** जब वे चहलकदमी को निकले तब हम जा रहे थे खेत – खलिहान ,कल- कारखानों की तरफ हमें वक्त ही कहां कि सोच भी सकें चहलकदमी पर और …
संस्कृति ******* पूंछ फटकारती सिंगोली हिलाती दूध की गंगा बहाती कामधेनु जाने कब से एक ही थूनी पर बंधी करती आ रही वहीं वहीं गौमूत्र गोबर और जुगालते हुए भूसा …
मुझे कबंध मत समझना ********************** मेरी भुजाएं कभी भी उखड़ कर गिर सकती हैं बार – बार टटोल कर पाया है कि वे मेरे कंधों से चिपकी भर है एक …
