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सूरज
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( १ )
सूरज आज भी मिलता तो है
लेकिन औपचारिक मुस्कुराहट लिए
बचपन के खिलौने जैसा
काफी पीछे छूट गया सूरज
परिवार का होकर भी मुझसे ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में मनुष्य की प्रकृति से ,खगोल से जिस तरह की दूरी स्थापित हो चुकी है वह विचारणीय है ।आज वर्तमान समय में बहुमंजिली इमारतें , ऊंचे भवन, फ्लैट की बंधी जीवन शैली में शहरी ,नगरिय व्यस्तता और कामकाजी ,दफ्तरी जिन्दगी के बीच फंसा आदमी सूरज को निकलते और ढलते देखता तो है लेकिन उसकी धूप,उष्मा ,ऊर्जा से अपने तन – बदन मन में आत्मा में स्फूर्ति और सुकून महसूस नहीं कर पाता ।सूरज है यह प्रतीति आज के जन जीवन में समाई तो है परन्तु उससे मिलती गर्माहट का अनुभव और अनुमान मुश्किल से ही कोई कोई आत्मसात कर पाता होगा ।आज के आदमी के व्यस्त जीवन में सूरज तो है पर वो निकटता नहीं है ।जिस तरह मनुष्य शहरों में रहकर ,नगरों में रहकर आत्मीयता के अहसास से दूर होकर बस औपचारिक संबंधों का निर्वाहक हो चुका है ।वह संबंधों की सहजता को भूल कर केवल शब्द भर विकट भाव स्थितियों में ही जीवन गुजारता है ।शहर ,नगर में लगाव और प्रेम केवल शब्दाचरण भर हैं ।मन : स्थिति और भाव दशाओं में यह लुप्त है ।हर मिलना बोझ भर होता है ।इसी तरह मनुष्य सूरज के साथ भी गहरे संबंध नहीं महसूस पाता ।उसके लिए सूरज का उगना एक सामान्य खगोलीय स्थिति है । मनुष्य के और सूरज के बीच जीवन की झलक नहीं मिलती ।सूरज तो मात्र उजाले का साधन भर है ।वह अहम नहीं ।उसकी उष्मा अहम नहीं ।वह समस्त फसलों और रक्त निर्माण में सहायक नहीं ।वह मनुष्य की चेतना और वंशावली को धरती पर बनाये रखने का जरिया होते हुए भी आज की व्यस्तता में नामालूम अवस्था का हिस्सा हो गया ।व्यस्त जीवन शैली ने सूरज जैसे अहम तत्व को नगण्य बना दिया ।यह सोचने की बात है । जिस सूरज के बिना जीवन दूभर और दुष्कर हो जायेगा ।उसकी हमारी जीवन शैली घनघोर उपेक्षा कर रही है ।वैसे भी यदि विचार करके देखा जाये तो हमारी भारतीय संस्कृति प्रतिमा पूजक नहीं है ।वह तो प्रकृति पूजक है ।वह सूरज की प्रार्थना करती है ।पेड़ों याने वृक्षों की उपासना और पूजा करती है । मिट्टी याने धरती की पूजा करती है ।पशुओं की पूजा उपासना करती है । नदियों को तीर्थ और मोक्ष दायक मानती है ।आकाश ही शिव हैं यह धारणा भी आस्था के भीतर से उपजती है ।इस तरह हम प्रकृति के ही उपासक हैं फिर भी आज की आधुनिकता ने मनुष्य के जीवन आधार के बीच से प्रकृति की महत्ता को विलग कर दिया और हमारी सांस्कृतिक जीवन शैली को केवल बाह्य बना दिया ।प्रकृति हमारी रोम रोम में रची बसी थी और उसी के कारण हमारा सामाजिक जीवन स्वस्थ और सेहत मंद बना हुआ था ।आज सूरज उसी तरह हम सब से दूर हो गया जिस तरह तरक्की का सपना देखते देखते कोई परिजन परिवार से दूर बहुत दूर शहर में या परदेस में जा बसे तब ऐसी अवस्था में उसके साथ जुड़े संदर्भ और संबंध के सूत्र कट जाते हैं लगाव की बातें दूर छूट जाती हैं और एक अजनबी पन और परायापन ,विलगता बीच में पसरी जाती है ।यही कुछ ऐसा ही आज मनुष्य और प्रकृति के बीच की आत्मीय सहजता ,सरलता में भी आधुनिक समय ने एक मोड़ ला दिया है ।प्रकृति से दूर जाता मनुष्य आज जीवन संकट से जूझ रहा है ।सूरज आज मनुष्य की उन्नति पर मुस्कुरा रहा है और मनुष्य उसकी मुस्कुराहट में छुपे आशय को असमंजस में पड़ा समझने की कोशिशें कर रहा है ।यह ना बूझने की कसमसाहट ही तो है जो मनुष्य को अपनी उन्नति पर संशय में डाल रही है ।सूरज का मानव जीवन से दूर हो जाना उन्नति है या नाश के संकेत हैं ? यह विचारणीय है ।
विनीता रघुवंशी
