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सूरज
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( २ )
मैंने सूरज से कहा
चल यार फिर खेलें
तो वह थोड़ा ठिठका और
उचक कर जा बैठा बबूल पर
मैं कंटीली छाया में खड़ा
देखता रहा आसमान ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में कंटीली छाया पर विशेष विचार करने की जरुरत है ।क्या है यह कंटीली छाया ? यह पर्यावरण का अति दोहन की स्थिति से उपजी धरती की उजाड़ दशा तो नहीं ।सूरज के साथ बचपन में जिस तरह की दोस्ती यारी बच्चों की बन जाती है वह बाल अवस्था का अबोध पन है जो धूप – छांव के बीच अपनी परछाई को खोजते हैं ।अपनी छाया से बनती आकृति पर मन ही मन लट्टू होते हैं ।धूप के चंदूकले को अपनी मुट्ठी में भर लेना चाहते हैं । सूरज की रोशनी को हथेलियों पर उकेरना चाहते हैं । धूप के टुकड़ों को सहेजना चाहते हैं ।यह है बचपन की मासूमियत और अबोधता ।कविता पढ़ते हुए बचपन की स्मृतियों में खो जाना क्या बड़ी बात नहीं ।सूरज रोज़ आता है हमारे घर के आंगन में लेकिन आज बचपन के पास उसके साथ समय बिताने का समय नहीं है । नन्हीं जानों के कंधों पर टंगें हैं स्कूल के भारी बेग ,हाथों में प्यास बुझाती बाटल का भार उठाए उनके नन्हें कदम कोसों दूर बंद कर दिए गये हैं कक्षों में सीखने को अनुशासन,आज्ञा पालन ,और दिये जाते अनुदेश – आदेश पर चलना ।बच्चों के लिए खींसो में अब मासूमियत नहीं रही वे वयस्क बना दिए जा रहे कार्टून,टी व्ही, , मीडिया के जरिए ।अब प्रकृति से बातचीत करना ,चिड़ियों के साथ फुदकना ,तितलियों के उड़ना सब ये सब दुर्लभ दुनिया के किस्से बन गये ।बचपन अब कल्पना से रंगीन नहीं बनता वरन यथार्थ ने उसे बदरंग कर दिया है ।यही सब तो है कंटीली छाया । जहां बचपन का आशय बदल गया है । वर्तमान समय में शिक्षा का अर्थ है होस्टल जहां बचपन को संरक्षित नहीं किया जाता वहां धनबल पर बच्चों को कैद में डाल दिया जाता है ।वह इन हालात में प्रकृति के करीब कैसे पहुंचेगा यह सोचने का विषय है ? वह सूरज ,चांद ,तारों से कैसे अपनत्व बढ़ायेगा ,पेड़ पर चढ़ना ,झूला झूलना ये सब कैसे सीख पायेगा ।सूरज कैसे उसके भीतर स्फूर्ति भर पायेगा ।वह तो बचपन को जानता ही नहीं इसीलिए तो वह उचक कर बबूल पर जा बैठा ? यह उचकना बच्चे तो भूल ही बैठे हैं । उन्हें डालों पर लटकना भी नही आता ।सूरज भी अब बच्चों के साथ खेलना भूल गया ।बच्चों को जब सूरज मिलता है तब दोपहर हो जाती है और उसके डूबने का याने अस्त होने का समय हो जाता है खेला तो भोर में जाता है यह असमय खेलने का प्रस्ताव तो सचमुच अचरज में डालने वाला ही है ? कविता आदमी की मन: स्थिति के बारे में बहुत कुछ कह कर भी अनकहा छोड़ जाती है ।क्या सचमुच हम बचपन को इतना उन्मुक्त कर सकेंगे कि वह प्रकृति के साथ अपने आपको ,अपनत्व को जोड़ पाए ? आधुनिक वातावरण ने भव्य भवनों , बहु मंजिली इमारतों ,फ्लेट संस्कृति में उलझा कर रख दिया जिससे वह जीवन की सहजता प्रकृति का साहचर्य सब विस्मृत कर चुका है ।सूरज को बबूल से उतार कर आंगन तक लाएं और अपनी जिन्दगी के कंटीले पन को हम कम कर सकें ।इस सभी का प्रयास किया जाना चाहिए ।
विनीता रघुवंशी
