14
वे ,मां ,बहन ,भाई ही होते हैं मेरे
**************************
जब भी
निहत्था मारा जाता कोई
वह सगा भाई ही होता
मानो दाहिना हाथ ही
काट लिया हो किसी ने मेरा !
जब भी
जलाई जाती कोई लड़की
वह बहन या बेटी ही होती
मानो राखी का परब ही
उजाड़ दिया हो किसी ने मेरा !
जब भी
हैवानियत का शिकार होती कोई औरत
वह मां ही होती मेरी
मानो छीन लिया हो किसी ने
मुझसे वात्सल्य सिन्धु ही मेरा !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में अहसास को महत्व दिया गया है।समाज में जिस किसी के साथ अन्याय , अत्याचार,या शारिरिक कष्ट और पीड़ा पहुचाई जाती है उसके साथ अपनी निकटता को महसूस करना ही संवेदना है ।हर बार जब भी निहत्थे को नफरत का निशाना बनाया जाता है तब हम बहुत सारे आशय जोड़ कर अपने आपको अलग कर लेते हैं जैसे –वह तो हमारी जाति का नहीं था ,हमारे धर्म का नहीं था ,हमारे पेशे या धंधें , व्यवसाय का नहीं था , हमारी उससे कोई जान पहचान नहीं थी । इसलिए हमें उससे कोई संवेदना या सहानुभूति नहीं है ।ये सब मामूली कारण है । यहां यह देखना लाजमी है कि पीड़ित एक मनुष्य है ,और मनुष्य के साथ हुआ हर अत्याचार ,अन्याय हमारे साथ हुआ ही मानना चाहिए ।जब इस स्तर पर हमारी अनुभूति ,हमारी करुणा ,हमारी संवेदना , और दृष्टि होगी तब ही हम पूरे समाज के साथ साझा योगदान और सहयोग की भूमिका निभा सकेंगे ।जब तक हमारी दृष्टि ,हमारी विचार भूमि में अलगाव और परायापन रहेगा तब तक हर अत्याचारी का हौसला और हिम्मत दुगनी होती रहेगी ।वह अन्यायी भले ही हमारी जाति धर्म सम्प्रदाय का ही क्यों न हो ।समाज का हर व्यक्ति हमारे तन ,मन,से पूरी तरह संबंधित है । समाज के हर व्यक्ति का दुख ,कष्ट,पीड़ा ,यातना समाज के हर व्यक्ति की चेतना में शामिल होना चाहिए तब ही तो मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ।यह धारणा बलवती होगी ।जब तक समाज में परस्पर अत्याचार के कारण वजह अमानवीय वैचारिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती रहेगी तब तक समाज की सहानुभूति रेखा भी यहां – वहां भटकती रहेगी ।सबसे पहले समाज के हर व्यक्ति की मन: स्थिति बदलनी होगी कि समाज का कोई भी प्राणी तन से ,शरीर से भले अलग-अलग हैं लेकिन अनुभूति ,कष्ट,दुख के स्तर पर सब समान ही हैं ।यह परदुख कातरता ही तो करुणा है ।यही संवेदना की मर्मस्पर्शी जमीन है । जब भी किसी भी व्यक्ति की बेवजह जान ली जाती है तब हमारा भाई ही होता है । कविता में जिस तरह ‘मानो’ शब्द के प्रयोग से अनुभूति को उकेरा गया है ।वह उल्लेखनीय है ।इतनी गहरी आत्मानुभूति और करुणा का ऐसा मर्मस्पर्शी स्वरुप बहुत ही अद्भुत है ।समाज में हर अन्याय झेलने वाला हमारा सगा संबंधी ही है यह कल्पना मनुष्य को अपने मन में सदा बनाए रखनी चाहिए । स्त्रियां हों या भाई सभी समाज के हिस्से और अंश ही होते हैं।वे परिवारों के निर्माण में उनका अंग हैं ।इन अंगों के मिलने से ही परिवार ,पड़ोस,समाज बनता है ।यदि परिवार में मां न हों तो परिवार धुरी हीन होंगे ,बहन ना हो तो पर्व त्यौहार सब उजड़ें और निर्जीव होंगे ।भाई ना हो तो भरोसा खत्म हो जायेगा ।परिजन तो आदमी के समूचे व्यक्तित्व के निर्माता होते हैं । समाज इन्हीं परिजनों के लगाव भरे कंधों पर स्थिर रहता है ।समाज की दृढ़ता भी परिजनों पर आधारित रहती है ।समाज में यदि परिवारों और परिजनों के प्रति संवेदना गहरी होगी तो समाज की चेतना हिंसक नहीं वरन अहिंसक होकर समाज निर्माण की ओर उन्मुख होगी ।आज वर्तमान में समाज की चेतना हिंसक और विध्वंसक हो गयी है ।समाज को पुनः अहिंसा की ओर लौटना होगा ।यही चिन्तन का इशारा है ।
विनीता रघुवंशी
