Home आज की कविताउसी आग की खोज में – तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

उसी आग की खोज में – तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
उसी आग की खोज में
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उसने कहा आग और में उसके पेट की तरफ देखने लगा
उसका पेट – पेट की आग से झुलस कर ठण्डा पड़ा था
जिसे वह अपनी मुट्ठियों में दबी आग से
सेंकता रहा देर तक
आग तो उसके चूल्हे में भी है लेकिन धुंधलाती हुई
जिसके मारे घर भर की आंखें नम हैं
ऐसे में खांसती – छींकती बूढ़ी मां कह रही बहू से
परेशान मत हो सुहागन —
जिसकी सास करती है लाड़ उसकी आंखों में धुआं
कुछ ज्यादा ही लगता है
सबसे परे एक आग और है पूरे गांव में
जिसे जाने कहां रख कर भूल गया होरी
मैं उसी आग की खोज में पूरी तरह मुखातिब हूं
कच्चे घरों ,टपरियों ,झोपड़ियों की तरफ – – –
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —— तुम पूरी पृथ्वी हो कविता “ से उद्धृत )
आज की कविता में खोज है आग की ! आग के बहुत सारे स्वरुप और बोध होते हैं ।एक आग पेट की क्षुधा होती है ।एक आग कामना की होती है ।एक आग चेतना की होती है ।एक आग आत्मबोध की होती है ।एक आग चूल्हे की होती है जिससे खाना बनाया जाता है और यही आग मनुष्य ही नहीं प्राणीमात्र की क्षुधा अग्नि को ठण्डी करती है । मनुष्य एक चेतनावान प्राणी है और विचार और बुद्धि का उपयोग जीवन – निर्वाह में करता है । मनुष्य का समग्र जीवन आग को ठण्डा बनाए रखने में ही व्यतीत होता है । वह निरंतर ऐसे फार्मूले और उसूल तलाशता रहता है जिसके जरिए उसकी जिन्दगी आसान और सरल हो जाये । लेकिन हर दफा वह जिन्दगी को कठिन से कठिन की ओर ही धकेलता रहता है ।पेट की आग को ठण्डी रखने के लिए वह संघर्ष के रास्तों का चुनाव करता है और यह चयन ही तो है जो उसे मजबूर ,मजलूम , लाचार बनाता है। याचक बनाता है । यह आग मनुष्य होने की चेतना की आग है जो होरी मुंशी प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास गोदान का मुख्य पात्र हैं के भीतर महसूस की जा सकती है । मनुष्य होने की चेतना की आग ही सबसे महत्वपूर्ण है ।न्यून रोजगार और अभाव से अधपेट खाये मनुष्य की उस चेतना रुपी आग को जानना समझना जिससे घर भर की आंखें नम हो जाती हैं ।यह नमः होना आंसुओं से भींगी रहना ही तो वह मजबूरी है जिससे आदमी हर वक्त संघर्ष करता रहता है ।हर परिजन और परिवेश इस नमी की अनुभूति का अहसास करता है । आग की तरफ मुखातिब है रचनाकार ? यह कौन सी आग है जो खोजी जा रही है उन गरीब मेहनत कश मनुष्यों के भीतर जो टपरियों में हैं ,जो झोपड़ियों में है ,जो कच्चे घरों में है और दिलासा दे रहे हैं लाड़ – प्यार ,आत्मीयता का ।इनके सूत्र बंधें हैं लगाव से ,प्यार मोहब्बत से ,भरोसे से ,मनुष्यता के गहरे बंधन में सांस लेते ये मनुष्य ही तो हैं चेतना की आग को समेटे हुए ,खिलाफत,विरोध की ताकत से भरपूर ।उस मनुष्य होने की चेतना संवेदना करुणा के भीतर से जो ताकतवर आवाज आग बनकर फूटेगी वहीं आग तो मनुष्य होने की निशानी है ।इस मनुष्यता के पक्ष में खड़े स्वर के बीच छुपी आग की खोज ही तो अहम तलाश है । मनुष्य होना और लिजलिजा होकर जिन्दगी गुजारना कोई मायने नहीं रखती ।जिन्दगी के मायने तो मनुष्य होने की चेतना के होने पर ही है । झुग्गी – झौंपडी में बसर होती जिन्दगी में भी आग होती है जो स्वार्थ ,लालच,लालसा ईर्ष्या ,द्वेष को धता बताकर जीती है ।जो मनुष्य स्वार्थ में अन्ना होकर जीवन बसर करता है उसमें आग का नामों निशान नहीं होता ।आग की खोज मनुष्य होने की अनुभूति और अन्तर लय में होती है ।यही आग समय समय पर आदमी के मिजाज , स्वभाव में प्रकट होती रहती है ।आदमी होने के लिए चेतना का होना जरुरी है ।हर चेतनावान मनुष्य नकल अनुकरण से दूर रहता है । यही चेतना की सच्ची पहचान है । 🙏विनीता रघुवंशी

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