Home आज की कवितासूरज-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

सूरज-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सूरज
******
(५ )
सूरज ,जो सुबह से शाम तक
चक्कर लगाता था आसमान में
अब अलावों चूल्हों में भी
ढूंढें नहीं मिलता
जाने किस समुद्री सतह या पहाड़ में
उलझा रहता है आजकल !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में सूरज आकाश में रहकर भी नजरों से ओझल रहता है । वर्तमान भवन निर्माण की कला ने मनुष्य से प्रकृति के आनंद को छीन लिया है ।घर बने ,मकान बने ,बहुमंजिला इमारतें बनी , गगनचुंबी भवनों ने आंगन का खुलापन ,बरामदा , सहन, बगीचा की खुली हवा, धूप , उजाला सब छीन लिया ।आंगन का आनंद और गपशप सब आंगन के खत्म होते ही आदमी अपनी चारदीवारी में बंद हो गया ।उसके सुख – दुख सब निजी हो गये ।हर घर ,मकान एक किलेनुमा गुफा भर होकर रह गया जहां चिड़िया तक पर नहीं मार सकती फिर आदमी की बिसात और औकात ही क्या ।आदमी – आदमी से दूर अपनत्व से विरत होता गया ।ऐसे हालात में सूरज भी पहाड़ ,जंगल और समुद्र की सतह तरफ मुड़ गया ।यह आधुनिक जीवन शैली और स्थापत्य कला के घोर एकाकी नमूने हैं ।जब घरों में प्राकृतिक रोशनी,हवा ,उष्मा नहीं प्रवेश कर सकती तो आपके द्वार पर अतिथि देवो भव: का स्वागत वाक्य कैसे प्रवेश कर सकता है ? यह विचारणीय है।यह तो हमारे चिन्तन में घर या मकान बनाते समय ही होना चाहिए ।सूर्य का ताप जीवन के निखार के लिए बहुत जरुरी है ।सूर्य प्रकृति की ऊष्मा पाने का सबसे अच्छा स्रोत है । लेकिन जब से मनुष्य ने पश्चिमी जीवन शैली को स्वीकार किया है तब से सूरज की ऊष्मा पाने के लिए आदमी को समुद्र तटों , पहाड़ों पर खोजने जाना पड़ता है ।अब सूरज गलियों में , आंगन में या सहन बगीचा ओटलों और बरामदों में आना छोड़ चुका है । आदमी भी अब पास पड़ोस छोड़ कर सैलानी बन चुका है । प्रकृति को वह चित्रों में देखता है ,फिल्मों में ,या वीडियो और तस्वीरें में देख कर प्रसन्न होता है ।चूल्हे और अलावा भी अब दुर्लभ हो गये हैं ।जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है उसका खुलापन ,उसका तन और मन भी साझा होता है ।यह समाज की व्यहारिक चेतना है ।इस से दूर होकर मनुष्य न तो घर – परिवार का होता है न समाज का न वह वैज्ञानिक हैं न वह भौगोलिक है न वह आध्यात्मिक ही है ।आज मनुष्य ने अपने आसपास विज्ञान को जिस तरह नेट याने जाल की तरह बुन लिया है उसमें वह स्वयं मकड़ी की तरह उलझ गया है ।इस उलझन में उसके पास बहुत सारे तनाव है ,बहुत सारी मनोग्रंथिया हैं ,बहुत सारी कुठाएं हैं ।आज वर्तमान मनुष्य प्रकृति की सहज स्थिति से दूर जा कर केवल निष्ठुर इच्छाओं का दास बन चुका है । मनुष्य की इस प्रकृति और स्वभाव से सूरज भी उसका साथ छोड़कर मैदानों ,पहाड़ों समुद्र तक जा पहुंचा ।सच है आदमी ने अपने परिवेश , पर्यावरण और पर्यावास को बहुत ही जटिल बना दिया है ।इस जटिल जीवन शैली के दुष्परिणाम भी मनुष्य को स्वास्थ्य,सेहत और स्वाद की धरोहर से विलग कर दिया है । जीवन का उन्नयन चारदीवारी में नहीं उसके खुलेपन ,उदार स्वरुप में ही होता है । 🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More