Home आज की कवितासन्तू ,मेरे दोस्त-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

सन्तू ,मेरे दोस्त-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सन्तू ,मेरे दोस्त
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( ४ )
एक बेचैनी
एक तनाव के बीज लेकर
जिस संवेदनशील जमीन पर
खड़े हो वहीं से
शुरु करनी होगी बखरनी – बोवनी
ताकि उगती बढ़ती फसलें
हमारे चित्त ,हमारे मन
हमारी बुध्दि को दे सकें
हरे – भरे संस्कार
लहलहायें उत्तेजनाएं हमारे भीतर
दूधिया गंध की !
यह ठीक है कि तुम
अपने भीतर की
जंजीरें तोड़ने को आतुर हो
जिस वक्त
बाहर की
बेड़ियां भी तोड़ लोगे
उस वक्त तुम
एक पद न होकर
एक वर्ग
एक वर्ण
एक समाज
एक वाद
एक साम्य विचार लिए
सर्व- हारी होंगे समस्त गलों के
तब जो भी
समझना – समझाना चाहोगे
उसके समर्थन में उठेंगे
असंख्य – असंख्य हाथ
एकता से बंधे
सख्त होते हुए
जज्बातों के बिना
प्यार की तासीर को
महसूस नहीं किया जा सकता
न पाया जा सकता
अवाम का सबसे ऊंचा लक्ष्य
न इतिहास
न द्वन्द्व
न दुनिया भर की
समानता का अहसास
न वैज्ञानिक
विचारों का चरमोत्कर्ष
प्यार के बिना
कविता की समझ भी
संज्ञानित नहीं होती दोस्त !
मैं जानता हूं
तुम्हारी छटपटाहट
सन्तू ,मेरे दोस्त !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
(लंबी कविता का अंतिम अंश )
सन्तू का ओहदा पा जाने का सपना एक बदलाव के विचार को जन्म देता है ।सन्तू अपनी शिक्षा के जरिए समाज को बदलने और सामाजिक समानता लाने का एक विचार मन में पालता है । यह उसके भीतर एक बेचैनी और छटपटाहट को उभारती है । यह विचार जब तक समाज का हर व्यक्ति हर तबका और हर वर्ग अपने भीतर महसूस नहीं करता तब तक समाज के निचले स्तर तक बदलाव का यह स्वर नहीं पहुंच सकता ।जब तक मनुष्य अपने आप से ,अपने समाज से ,अपने देश से अपने तबके और अपने वजूद से प्यार नहीं करता तब तक वह बदलाव के प्रति निस्पृह ,निरपेक्ष ,और उदासीन ही रहता है ।सन्तू एक तनाव को अपने भीतर महसूस करता है और पूरे समाज को परिवर्तित करने का विचार अपने मन ,चित्त ,और बुध्दि में उभारता चलता है लेकिन यह वैचारिक बदलाव उतना सरल नहीं है ।उतना आसान भी नहीं है ।बदलाव के लिए संस्कारों की जमीन तैयार करना होगी तब ही वैचारिक दूधिया गंध की महक फैलेगी ।यह दूधिया गंध याने मां की गोद में पलते – ढलते विचार का ही पोषण मानसिक गठन में परिलक्षित होने लगे । संस्कार की वैज्ञानिक पृष्ठ भूमि माता – पिता के वैचारिक रूप से बनती – बिगड़ती है । यह समाज परिवेश और पूर्वजों के आचरण से भी निर्मित होते हैं । सभ्यता का रुपान्तरण समाज की जीवन शैली से आता है लेकिन संस्कार तो परिजन ,परिवेश ,समाज के वैचारिक धारणाओं और मत मतान्तरो से रचे जाते हैं ।लोक व्यवहार भी इसमें रचनात्मक भूमिका निबाहता है । सन्तू अपने भीतर बनी अवर्ण – सवर्ण की बुनियादी धारणाओं को तोड़ने के लिए आतुर है ।यह गैर बराबरी ,यह वर्ग उच्च ,मध्यम, और निम्न का भेद ,वर्ण का भेद काला – गोरा ,चम्पई, आदि या ब्राह्मण ,वैश्य,क्षत्रिय और शूद्र , जाति भेद समाज में व्याप्त जाति और कुल ये सब भी मन को चित्त को और बुध्दि की व्यापकता को संकीर्ण करते हैं । मनुष्य मनुष्य सब समान है लेकिन समाज की इन धारणाओं की बुनियाद इतनी गहरी है कि इन्हें आसानी से आम आदमी तोड़ नहीं पाता यही तो जकड़न है जिसमें समाज और मनुष्य का मन बंधा हुआ है ।इन अदृश्य बंधनों से मुक्त होना ही तो समाज में साम्य स्थापित करने का मूल भूत विचार है ।यही तो आम आदमी को समाज के बाह्य और अन्तर स्तर पर एक करने की संवेदनशील पहल है ।सामाजिक समानता की एक गहरी प्रक्रिया और पध्दति का अनुशीलन कविता में किया गया है ।कविता में सन्तू गहरे वैचारिक समझ को विकसित करने का जरिया है । यहां से यह जाना जा सकता है कि सामाजिक संरचना में विचार की अहम भूमिका है ।बिना विचार के किसी भी तरह का और कोई भी बदलाव संभव नहीं है ।समाज के हर तबके के पास वैचारिक परिवर्तन का बोध जागृत होना बेहद जरुरी है । बिना जागृति के बुनियादी बदलाव सतही होता है । वैचारिक बुनियाद का ठोस रुप ही जनमानस को एक जुट कर सकता है । जब तक भावनात्मक जागरुकता का अहसास नहीं होगा ।जब तक अपने आपसे अपने समाज से अपने देश से अपने भीतर गहरा लगाव और प्यार नहीं होगा तब तक यह मानसिक ,चित्त,और बुध्दि की एक रुपया भी स्थापित नहीं होगी। जन मानस के लिए सबसे बड़ी समझ है प्यार ।इसके आगे इतिहास ,द्वन्द्व ,सांसारिक समानता का सपना , वैज्ञानिक विचार का उच्चादर्श सब फीका होता है ।केवल प्यार की संवेदनशीलता ही कारगर समाधान है । इस “प्यार ” के बोध के बाद सभी वाद ,सभी विचार ,सभी संवेदना , का बोध ही कारगर होता है ।पहले प्यार की अनुभूति का होना बेहद जरुरी है । प्यार क्या है इसका अहसास ही ,इसका जान लेना ही आदमी के वैचारिक ठोस बदलाव की वजह बनता है ।अन्यथा वर्तमान समय में जिस तरह सरकारी कर्मचारी के निचले स्तर से लेकर प्रधान पद तक का भ्रष्ट आचरण दृष्टिगोचर हो रहा है वह प्यार की कमतरी ही तो है । देश से बुनियादी भावनात्मक रिश्ता कमजोर हुआ और नफरत ,परायापन, और
हम वतनी के ख्याल दिल दिमाग के आचरण से बाहर हो गये ? अब फसलें भ्रष्टाचार की लहलहा रही हैं ।जनता और अवाम केवल बिसूर रही है शासन – प्रशासन दमकलें लिए आग लगा रहा है क्योंकि सत्ता के इशारों पर आग भी लगानी है और बुझाने के दृश्य भी उसे ही रचने हैं ।सन्तू तो बेहतरी के सपने लिए बदलाव का नक्शा रच रहें हैं । जनता के भीतर बदलाव की चेतना का जागना ही सही बदलाव की दिशा है ।यह सब वाद का हिस्सा नहीं है ।यह तो समाज की चेतना का बदलाव की ओर मुड़ जाना है ।कब तक भ्रष्ट अफसर ,भ्रष्ट सत्ता को वह सहेगी यह जनता को सोचना विचारना है ।सामाजिक अन्याय का विरोध ही सही मुकाम पर की गई यात्रा की शुरुआत है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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