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सन्तू ,मेरे दोस्त
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( ३ )
वहां भी हमेशा
बरसते होंगे हण्टर
नंगी पीठों पर
वहां भी
पण्डों – सण्डों या
सुअर- गाय को लेकर
होते होंगे फसाद
वहां भी
हिरण्यकश्यपो की चापलूसी में
सताये जाते होंगे प्रहलाद
वहां भी
खड़े होंगे भूखे खेत
मुकद्दम के द्वारे
वहां भी
मुतिया की जवान बिटिया
पालती होगी
चौधरी की गौशाला के सहारे
वहां भी
हरिजन टोलों में
लगती होगी आग
वहां भी
बंधुओं को नहीं मिलता होगा
अपनी मसक्कत का पूरा भाग
वहां भी
गरीब की औरत
सबकी भाभी होगी
वहां भी
साहूकारों के हाथों
इलाके की चाभी होगी
नियुक्ति पत्र के साथ
क्या इस नीयत से
बांध लाये अपना गांव
कि उसे
जगह – जगह के परिवेशों से
ठीक ठाक गांव धोकर
चमका लोगे
तब तो
तुम्हारा यह विचार
बिना तर्क की तरह
फिजूल है
क्योंकि सदियों से
यही सब धोते -धोते
नदियां हो चुकीं प्रदूषित
खारे हो चुके समुद्र
सुर्ख लपटों को
पताका बनाकर
समझाना चाहते हो कि
मुट्ठियां कसे हाथ
हथौड़ों से कम नहीं होते
क्या यह सब
समझा दोगे यूंही
लोगों की आदतों को समझे बिना
जो कि आराम से
लेटे – लेटे ही
जान लेना चाहते
हों
मार्क्स – गोर्की ,गांधी के दर्शन
प्रेमचंद,हरिशंकर परसाई के चिन्तन
या कि निराला – नागार्जुन
त्रिलोचन – केदार बाबू की कविताएं
अभिव्यक्ति की
एक लम्बी लड़ाई से
गुजरे बिना न तो
मन के भावों को
अर्थ दिया जा सकता है
न रुप ,रंग ,आकार ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
कविता में -” वहां भी ” कहकर जिस तरह शोषण के तमाम तरीके और सामाजिक अन्याय के जिन रुपों का विस्तार से बयान हुआ है वह हमारे जन मानस की सच्चाई ही है ।हम हर न्याय की प्रक्रिया को अन्याय करके ही सुधारना चाहते हैं ? न्याय की हर मिसाल एक अन्याय और शोषण पर ही टिकी होती है ।वे रुप जो शोषण के लिए समाज में अपनायें और मिसाल के लिए प्रयुक्त होते हैं उन सब में अमानवीय व्यवहार ही मुख्य होते हैं ।देश की पूरी न्याय व्यवस्था अंग्रेजी शासन के कानून और समाज के मुख्य ओह्दे दारों की मनसूबों पर आश्रित होती है ।जमींदार ,धन्नासेठों और अधिकारी के रवैये पर न्याय टिका रहता है ।जिसके पास सत्ता की ताकत होती है वहीं व्यवस्था को हकालता रहता है ।कविता में सन्तू एक सरकारी अधिकारी हैं जिन्होंने समाज की असमान स्थितियों को बहुत करीब से महसूस किया है और इस असमान लोक व्यवहार की नीति को ,गैर बराबरी को पूरी तरह बदलना चाहते हैं ।हर उस दृश्य को जो उन्होंने व्यवस्था के भीतर रहकर अनुभव किया उसे अपने ओहदे का , पद का सही इस्तेमाल करके समाज को शोषण के रास्तों से मोड़ना चाहते हैं । समाज में गरीबी और शोषण के हालात बदलना चाहते हैं लेकिन यह सरलता से मुमकिन नहीं ? क्योंकि सत्ता फिर वह कैसी भी हो याने राजनैतिक सत्ता तो जनता के बीच रहकर शोषण करती ही है किन्तु आर्थिक सत्ता का रुप भी बहुत विषैला होता है ,धर्म की भी अपनी सत्ता और व्यवस्था होती है जो मनुष्य को वैचारिक अंधत्व से मुक्त नहीं होने देती ? चौथी सत्ता सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों की होती है जो शासन – प्रशासन में योजनाबध्द ढंग से दखल का आकार रचती है ।प्रचार तंत्र की भी एक पूर्ण सत्ता होती है जो जनता को पूरी तरह भ्रमित रखकर शोषण के नये नये रास्ते खोजती है ।यह सब सत्ता के यथार्थ हैं जिन्हें आसानी से नहीं समझा जा सकता है ।कोई भी व्यक्ति जब बदलाव के लिए मैदान में सामने आता है तो उसे सत्ता के इन्हीं शोषण कारी रुपों से टकराना होता है ? गांव चाहे सन्तू का हो या हमारा सबसे बड़ी दिक्कतें वहीं है जो समाज के आर्थिक कमजोर तबके की होती है ? सजा के लिए हण्टर और नंगी पीठें हैं ,फसाद और दंगें कराते पण्डों की साजिशें हैं , सत्ता के आसपास चक्कर लगाती चापलूसी है जो हर बार प्रहलाद को सताने के लिए तत्पर है ,हर गांव की तरह दलाल के सामने मजलूम किसान अपने भूखे खेत लिए खड़े होंगे ।यह दृश्य चित्रण बहुत ही मार्मिक है । हर गांव की तरह देह शोषण के किस्से चौधरी की गौशालाओं में बनते- बिगड़ते होंगे ? मुतिया की जवान बिटिया पलती है वहां भी ,हरिजन टोलों में हर जगह हड़पने के लिए आग लगाई जाती होगी वहां भी जिस तरह जलती है बस्तियां मणिपुर और अन्य कई इलाकों में बंधुआ मजदूर हर जगह की तरह वहां भी मजबूर होंगे अपनी मेहनत के हिस्सों को पाने के लिए,धन्ना सेठों के हाथों में तरक्की और आर्थिक उन्नति की चाबी झूल रही होगी ? क्या अलग है यहां और वहां में ? क्या गांव को परिवेशों के बीच ले ले जाकर अपने गांव की स्मृतियों में कौन सा बड़ा बदलाव लाने की नीयत है ? केवल अफसर बन जाने से सत्ता के मिल जाने से अफसर कोई बड़ा बदलाव नहीं ला सकता ,सत्ता हर बार अफसर और सरकारी अमलों के कान उमेठती रहती है और अधिकारी अपना आचरण हर वक्त सत्ता के साथ तालमेल बैठाने में ,जी हुजूरी करने में ही मशगूल हो जाता है उसकी चेतना भी माहौल के अनुकूल धूमिल हो जाती है ? समाज में चेतना और विचार को बदलें बिना वैचारिक बदलाव के हौंसले बुलंद करना व्यर्थ है ।समाज हर समय यथास्थिति में ही जकड़ा रहना चाहता है ।उसके लिए मार्क्स और गांधी का दर्शन फिजूल है क्योंकि वह प्रयोग शील नहीं है ।वह अपनी वैचारिक जकड़न से मुक्त होना। नहीं चाहता वह जैसा है वैसा ही जिन्दगी को गुजार लेना चाहता है बदलाव के जोख़िम और संघर्ष के बिना ही यथास्थिति बरकरार रख कर ।भय है बदलाव से ,चेतना से , संवेदना से , न्याय से , सत्ता से ? सवाल तो यहीं से है कि जिस वक्त मुट्ठियां बंधे हाथ हथौड़ों की तरह मजबूत होंगे याने जब श्रमजीवी एक होंगे तब सामाजिक अन्याय भी न्याय में तब्दील होगा ।समाज को दर्शन समझने के लिए प्रयोगशील होना होगा ,साहित्य के बंद दरवाजों को खोलना होगा ।समाज को अपने बौध्दिक चिन्तकों , साहित्यकारों के नजदीक जाना होगा तब ही यथास्थिति से मुक्ति का रास्ता मिलेगा । अभिव्यक्ति की बेचैनी ही वह लड़ाई है जिसका समाज के हर व्यक्ति को सामना करना होगा ।यह संघर्ष लंबा है इसके बिना मन के विचारों को न तो अर्थ दिया जा सकता है न रुप न रंग न आकार ही दिया जा सकता है ।बदरंग जीवन किसी की आत्मा ,मन, और चेतना को परितृप्त नहीं कर सकता ।
विनीता रघुवंशी
