Home आज की कवितासन्तू ,मेरे दोस्त-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

सन्तू ,मेरे दोस्त-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सन्तू ,मेरे दोस्त
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( २ )
( जन चरित्री होने के लिए
मुक्त होना ही पड़ता है
अपने अन्दर के ब्रह्मराक्षसो से )
मैं गहराई से
जानता हूं तुम्हारी दिक्कतें
कि तुम
एक सुनिश्चित
बदलाव चाहते हो आद्योपांत
( बदलाव का दूसरा नाम
और अधिक सुन्दर
बनाना ही नहीं होता है समाज को )
लेकिन यह भी
समझ लेना चाहिए
कि तुम जो भी
चाहते हो उसके
अंग – अंग का
संचालन कर रही है
राजनीति की नागिन
फूलों में बैठी
हर जगह मुस्कुराती हुई
जिसके फैन पर पद्म और
स्याह सम्मोहन है
पूंछ तक चमकता हुआ
ऐसे में —-
एकदम चौकन्ना रह कर भी
कहां – कहां अहिंसक रहोगे दोस्त !
ऐसी भी
कैसी गंवई हरकत है तुम्हारी
कि तुम
बिना देस
बिना गांव के
सुकून से रहना भी नहीं जानते
मातहतों के बीच
जब कि तुम्हारा गांव भी
रुढ़ियों के खूनी जबड़ों में फंसा
लहुलुहान ही तो होगा
सभी गांवों की तरह
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
जन चरित्र एक ऐसी कल्पना है जो हमने आजादी के संघर्ष में बहुत नजदीक से देखी और उसके नेतृत्व में अहिंसा के मार्ग का अनुसरण भी किया है ।हमारे समाज ने हर बार नेतृत्व कारी जन चरित्र को श्रीराम ,श्रीकृष्ण ,गौतम बुध्द , महात्मा गांधी अंबेडकर आदि में देखा है ।जन के हित में काम करना ही तो जन चरित्री होना है ।ये जन चरित्र ब्रह्मराक्षसो से मुक्त होते हैं याने इन की शिक्षा दीक्षा में पूर्वाग्रह , धारणाओं ,और रुढ़ियों की परिपाटी का निर्वहन नहीं होता ।इनकी वैचारिक पृष्ठभूमि तर्क शील और वैज्ञानिक होती है । तर्क पर निर्मित धारणाएं और विचार इन्हें मुक्ति का उजाला दिखाते रहते हैं । मनुष्य की वास्तविक मुक्ति उसकी मानसिक मुक्ति होती है ।भय से मुक्त होना या कहें निर्भय होना ही सामाजिक न्याय का बेहतर बदलाव है ।समाज के हर व्यक्ति में यदि यह मानसिक अवस्था दिखती है तब ही समाज के भीतर चेतना का संचरण होता है ।एक अकेले की चेतना से कुछ बदलाव नहीं हो सकते ।समाज के हर व्यक्ति की चेतना का बदलाव ही समाज का बेहतर बदलाव लाना है ।शोषण के हालात और तरीकों से मुक्ति ।उन धारणाओं और विचारों से मुक्ति जो ऊंच नीच श्रेष्ठता कनिष्ठता का सामाजिक स्वरुप रचती है उन से मुक्ति ? यही तो बदलाव का बेहतर विकल्प है ।समाज का आद्योपांत बदलाव चेतना के निर्भय हो जाने से ही संभव है । राजनीतिक सत्ता को नागिन के बिम्ब में ढाल देना भी कविता की खूबसूरती ही है ।सामाजिक गैर बराबरी का सारा चक्रव्यूह राजनीति ही कर रही है ।आज आरक्षण और वर्ग ,जाति ,सम्प्रदाय ,हरिजन ,गिरिजन, ब्राहम्ण,वैश्य,क्षत्रिय,और शूद्र के वर्ण समुदाय का भेद राजनीति की ही तो चालें हैं ।इस नागिन रुपी राजनीति के पास कमल याने पद्म और सम्मोहन का काला जादू है जिसमें समाज का हर वर्ग और वर्ण फंसा हुआ है ।यह राजनीति की नागिन मुंह से लेकर पूंछ तक चमकता हुआ जादू लिए है ।जो हर वर्ग और वर्ण को विस्मित और चकित कर रही है ।आज राजनीति ने हर संस्थान को अपने वश में कर लिया है ।जब भी जन नेतृत्व समाज में न्याय की ,गैर बराबरी की दशा बनाने के लिए खड़ा होगा तब वह चाह कर भी अपने आपको अहिंसक नहीं रख पायेगा ।उसे हर बार नागिन रुपी जहरीली फुफकारती सत्ता से आमना – सामना करना ही पड़ेगा । एक दम चौकन्ना रहकर भी सत्ता के विषैले प्रदूषण से तो टकराव होगा ही ? यह आज वर्तमान में पूरी सच्चाई के साथ जन नायक को माहौल का सामना करना ही पड़ रहा है । यह हकीकत है । दोस्त की नसीहत भी है और चिन्ता भरी संवेदनशील बेचैनी भी ।दोस्त का अति भावुक होना दोस्त को परेशान कर रहा है कि तुम भी अपने मातहतों के साथ सुकून से रहो जैसे दूसरे अफसर रहते हैं ।अपने वेतन और सुख सुविधा का भोग करते हुए ।बेवजह अपने गांव और अपने देस के लिए चिन्तित होने से क्या लाभ ? यहां का गांव हो या वहां का गांव । हर गांव रुढ़ियों के पंजों में फंसा ही होगा ।चाहे वह कहीं का भी गांव हो ।रुढ़ियों से तो खुद गांव को ही अपनी चेतना से मुक्त होना ही होगा ?
चेतना का बदलाव ही मुक्ति की शुरुआत है ।🙏 विनीता रघुवंशी

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