Home आज की कवितासन्तू ,मेरे दोस्त -तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

सन्तू ,मेरे दोस्त -तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सन्तू ,मेरे दोस्त !
*************
( १ )
( लंबी कविता का पहला अंश )
सन्तू ,मेरे दोस्त
मैं जानता हूं
तुम्हारी छटपटाहट
अच्छे खासे अफसर होकर भी
तुम सोचते हो
आम आदमी के बारे में !
अपने ओहदे से भी ऊंचा
देश को मानने की
जो भूल की तुमने
उससे बेचैनी ही मिलेगी
शानदार बंगले में रहकर भी
क्यों याद आती तुम्हें
पुरवा की झोपड़पट्टी ?
क्यों आते
ठिठुरते कांपते चुन्नी चमार
वर्दी पहनते वक्त खयालों में ?
क्यों आने लगती हिचकियां
भर्गो की भूखी आंखों पर सोचते हुए
जब भी कसते हो बेल्ट ?
तुममें एक पक्के माने जाने वाले
अधिकारी का एक भी
पुख्ता लक्षण नहीं है दोस्त !
लोग तो नियुक्ति पत्र का
ठप्पा लगा लिफाफा लेकर
ठप्पे से निकलते हैं अफसरी करने
लेकिन तुम तो
अपने बिस्तर बंद में
पूरा गांव ही
ठूंस लाये यहां तक
ऐसी भी कैसी भावुकता
कि बिला वजह
इधर से उधर ढोते रहें वजन
जब कि तुम्हारे ही बंगले के
मुस्तैद अर्दली
अपने – अपने गांवों से
निकलते वक्त
नारियल की तरह
फोड़ कर चले आये
आंगन के तुलसी चौरे पर खुद को
तुम भी
कर सकते थे ऐसा कि
अपने टूटे नारियल की चिट्ठों का परसाद
बांटते हुए निकलते
खुशी- खुशी घर से
लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया
और अब —
परेशान हो खुद से
मैं जानता हूं कि
एक अलग किसिम की
लड़ाई में
हो रहे शरीक
कि जिसमें
खुद ही होता
खुद का जबरदस्त दुश्मन !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
एक अफसर और एक रचनाकार की संवेदनशील दोस्ती के बीच संवाद से शुरू होती कविता ।कविता एक मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि से शुरू होती है ।सन्तू एक अफसर हैं जो व्यथित हैं अपने आसपास की उस मजबूर दुनिया में बसे आम आदमी की स्थितियों से ,अभावों से ,गरीबी से ,बेबसी से ।किसी गांव से केवल एक आदमी का अफसर बन जाना ,या सरकारी ओहदा पा लेना गांव के हालात नहीं बदले देती ? गांव में छूट जाते हैं बहुत से अभाव ग्रस्त परिजन , बहुत से अडोंसी – पड़ोसी,परिवेश और परिचित जन ।जो हृदय में बसे हैं ।अफसर बना अकेला आदमी अपने साथ बहुत सारे अभाव ग्रस्त लोगों से जुड़ी चिन्ताए भी लेकर निकलता है अपने साथ ।यही सन्तू की भी व्यथा है ।वह अपने ओहदे से बड़ा मानता है अपने देश को । यह कितना गौरव पूर्ण अनुभव है ।आज वर्तमान स्थिति में हर संस्था ,हर अफसर की ईमानदारी संदिग्ध हो चुकी है ।हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि यदि अफसर या चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारी भी अपने ईमान को बेच चुका है ।आज ओहदा बड़ा है और देश छोटा हो गया है ।देश के प्रति निष्ठा का भाव खतम हो चुका है ।आज हर कोई देश से बेईमानी और अपने आपको बिकाऊ साबित करने पर तुला है ।सच है सरकारी कर्मचारी बनते ही हर व्यक्ति अपने परिचय ,अपने रिश्ते – नाते भूलकर केवल अधिकार – दण्ड हाथ में पकड़ें दफ्तरों में दाखिल है और देश की चिन्ता ,अभाव ग्रस्त आम आदमी ,उसकी जरुरतें सब अनदेखी, अनसुनी हुई पड़ी है । यहां मुक्तिबोध की “अंधेरे में “कविता की पंक्तियां स्मृति में आ रही है —-” मर गया देश ,जीवित रह गये तुम ” सचमुच आज अफसर जिन्दा है देश तो मर चुका है ? सन्तू एक संवेदनशील मनुष्य है जिसके जेहन में अपना देश अपना वतन जीवित है ।जिसके पास चुन्नी चमार की ठण्ड से ठिठुरती कांपती देह का अहसास है ।जिसके पास भग्गो की भूख से तरसती आंखें हैं ? निदान बहुत दूर है।सन्तू भी अन्य अफसरों की तरह असंवेदनशील हो सकता है लेकिन
मन में उपजी करुणा उसे ऐसा करने से रोकती है ।अन्य सरकारी अफसरों के मिजाज और वृत्तियों से अलग सन्तू जिस भावुकता को महसूस कर रहा है यही सन्तू को खास और विशिष्ट बनाता है ।यह लड़ाई खुद से खुद की है ।अपने भीतर के आम आदमी और अफसर बने आदमी के बीच का संघर्ष है ।एक के पास उसकी अन्तर लय में देश की समस्याएं हैं और उनके समाधान खोजती फिक्र ,बेचैनी , और व्याकुलता है ? यह इतनी सघन है कि अफसर को खुद आम आदमी में बदल देती है ? यह चिन्ता का गहरा असर भी हो सकता है । कविता में समान समाज की दिशा को भी तलाशा जा रहा है ।सन्तू है ! चिन्ता भी है ? अभाव ग्रस्त समाज अफसर बनते हुए ,बेल्ट कसते हुए ? वर्दी पहनते हुए ? आमने – सामने और चेतना में बसा हुआ है ।अपने समाज की चिन्ता को सन्तू ने नारियल की तरह फोड़ कर चिटख की तरह परसाद में नहीं बांटा है याने अपनी जिम्मेदारी से विमुख नहीं हुआ है ।यदि उसने वर्दी पहनी है और कमर पर बेल्ट कसा है तो उसके सामने देश की समस्याओं के हल करने की फिक्र भी है ।इस तरह बहुत कम अफसर और अधिकारी रवैया अपनाते हैं ।आज वर्तमान में अधिकारी अपने ओहदे से मिलने वाले लाभ,सुख और आनंद को प्राथमिकता देते हैं ।मौज – मस्ती ही उनके पद का प्रमुख मकसद होता है ? सामाजिक न्याय और असमानता उनके जेहन को छूती भी नहीं है ? कविता शासन – प्रशासन के गैर जिम्मेदाराना अफसरी स्वभाव का लेखा – जोखा हमारे सामने उभारती है । 🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More