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कविता नारक्या दाजी के साथ
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( ३ )
लंबी कविता का अंतिम अंश
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ऋतुओं को
राग वि – राग बांटते नारक्या दाजी
जब भी अलापते
ऐसे – ऐसे जनगीत
तो ठिठक कर
देखने लगती मवेशिया आसक्त
रोआं – रोआं फूल उठता परिवेश !
शाम को अपने खाड़ू (जनता ) के साथ
उन्मुक्त लौटते तो ,
किसी दिन बाटी कन्द ,
मूसली ,तेंदू तो कभी
दोने में शहद और कभी
त्रन फूलों के गुच्छों से लदे
धरती की मीठी गंध से महकते नारक्यादाजी
जिनकी अगुआनी में
खिलखिला उठता सुनसान गांव
ठसाठस भर जातीं गोशालाए —-
सारे थूनी ग्वान!
बचपन में रेवड़ के पीछे पीछे
धूल – धूसरित होती
तूंबी का पानी पीती
पुटरिया से चटनी रोटी खाती
सुबह से शाम तक
दाजी के संग – साथ रहती मेरी कविता
दोजख और दीन की परवाह किए बगैर
घूम रही अपनी ही जमीन पर
अब भी —-
बिना किन्हीं अलंकरणों से लदी
बिना कहीं हमबिस्तर हुए
गर्दों गुबार चीरती
सभी की हरेक छोटी बड़ी चिंताएं ढोती
अपने ही इरादों
अहसासों से भरी ,मशगूल – – –
बिल्कुल बेबाक – – – !
तत्परता है मेरी कविता
अपने गांव के
नारक्या दाऊजी की स्वप्न छवियों के साथ !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
कविता में नारियां दाऊजी एक जन नायक की छवि में हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं । यहां ऋतुएं हैं और हर बार मौसम ऋतुओं के अनुसार अनुकूल और प्रतिकूल होता रहता है ।कोई ऋतु मन को अच्छी लगती है तो कोई ऋतु मन को उचाट कर देती है ।यही तो है ऋतुओं का राग और विराग । नारक्या दाऊजी का खाड़ू याने मवेशी जनता में रुपान्तरित हो जाते हैं ।यदि समाज उच्छृंखल और अनुशासन हीन है , मर्यादा को तोड़ कर जीना चाहता है तो यह सारा आचरण मवेशी के जैसा ही है ? मनुष्य का कदाचारी हो जाना अपने आपको पशु तुल्य बनाने जैसा ही कर्म है ।यह बात जो कविता के अन्तर लय में सुनाई देती है वह मनुष्य को मवेशी में बदल देती है ।एक ढोर चराने वाला अपनी चेतना को समाज के साथ जान पहचान बढ़ाने के लिए करता है ।उसके पास जंगल की पूरी जानकारी है । पत्थरों तक से वह आत्मीयता जोड़ लेता है और पत्थर भी अपने भेद उसके सामने खोलने लगते हैं ।यह चेतना का बहु आयामी स्तर है जो मनुष्य बनाती है । आज आधुनिक समय ने हमें अपनी चेतना के इसी स्तर से बेदखल किया है ।हमारे पास न तो स्वाभिमान बचा है न आजाद ख्याली का बोध ,न पानी की शान , न अपने पानी का वचन ही बच पाया है । स्वराज्य की चेतना और संवेदना भी आहत हो चुकी है ।”सब चलता है “में हमने अपने सम्मान और गौरव ,गरिमा की भी जरूरत को गैर जरुरी बना दिया है । जब चेतना का बोध उत्पन्न होता है तो हर मामूली आदमी भी खास हो जाता है । यहां नारकया दाऊजी एक मामूली आदमी है लेकिन चेतना के जिस स्तर पर अपने देश ,अपने काम ,अपनी आजीविका के प्रति समर्पित भाव और उसके एक एक पहलू से परिचय की जो वृत्ति है वह उन्हें खास बनाती है। ।आज आधुनिक मनुष्य आजीविका से जुड़ा तो रहता है लेकिन ऊपरी तौर पर ,केवल धनार्जन तक ही सीमित रहता है ।अपने काम को पहचान के तौर पर नहीं स्वीकारता है ।नारकया दाऊजी जंगल से औषधि का संचय भी करते हैं और अपने उस ज्ञान का गांव को लाभ भी देते हैं ।मूसली ,कन्द , मूल अर्थात जड़ों को लाकर गांव में देना भी उनकी जीवन चर्या का हिस्सा है । कविता की संवेदनशीलता नारकया दाऊजी के संग साथ धूल धूसरित होती हुई घूम रही है मवेशियों के पीछे पीछे नारकया दाऊजी के साथ तूंबी का पानी पीती चटनी रोटी खाती लोक अनुभव का हिस्सा बनी घूम रही है ।कविता का यह भ्रमण ही तो जन कविता बन जाना है ।नारकया भी जन नायक बन चुका है । लोक में घूमता हुआ नारियां को नरक और धर्म की कोई चिन्ता नहीं है ।वह तो बस अपने कर्मशील जीवन में ही धंसा हुआ है । नारियां कविता के अंत में जिस वैचारिक जमीन को स्पर्श करता है वह न केवल जन नायक की ही है वरन वह उन सब जन नायकों की विचार भूमि तक पहुंचा हुआ लगता है जहां जन नायक समाज के बेहतर बदलाव की स्वप्न छवि का सृजन करते हैं ।वे जन नायक जो समाज में बेहतर शिक्षा ,बेहतर स्वास्थ्य,बेहतर अर्थ व्यवस्था ,बेहतर ज्ञान की चेतना संवेदना के जीवन दायक ब्लू प्रिंट तैयार करना चाहते हैं वहां जाकर चेतना को स्थापित कर देती है ।आज राजनीति की विचार शून्यता ने जनता को खाडू में तब्दील कर दिया है अब जनता को अपनी इस छवि से बाहर आने के लिए वैचारिक बौध्दिक स्तर को रचना होगा । मनुष्यता की सभ्यता और संस्कृति की पुनर्रचना करना होगी ? शिक्षा अनुकरण मूलक पध्दति से अपनी शिक्षण पध्दति तैयार करना होगा ।
विनीता रघुवंशी
