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विनीता रघुवंशी
कविता नारक्या दाऊजी के साथ
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( २ )
एक – एक दरख़्त
एक – एक पौधा तिनका
मानता परिजन उन्हें
चिलचिलाती दुपहरी में
रींझ – रींझ पोंछती लताएं
दाऊजी के भाल का पसीना
ठण्ड में —-
डोंगर लांघ कर
वहीं धूप
भरती रग – रग में ताजगी
और बरसात में
छाता तानकर
खड़ी रहती चट्टानें
पेड़ पर्वत की भाषा
गिलहरियों की उछलकूद ,धींगा मस्ती
एक – एक पखेरु की
चहक का अर्थ जानते थे दाजी
पहचानते थे
घातक आहटों के इशारे
चकड़बों में फंसीं
लोमड़ियों के मन्सूबे
अंधी गली
गहरी गुफा
शिकारियों की हत्यारी हरकतों को
खूब खूब समझते थे वे
और संवेदनशील इतने कि
कान लगा सुन लेते
पत्थरों की आत्माओं में
झरनों की —
कल – कल करती स्वर लहरियां
आत्मीय इतने कि
समुद्र से छक कर
लौटे बादल
जब कर रहे होते
सतपुड़ा पर विश्राम
तो सुनाते उन्हें
किसानिन का यह उपालम्भ -गीत —
” किस्सा कहानी दोहरा
कछु न सीखें कंंत
हल हांकत जनम गयो
रचे बैल के दन्त “
जिसे सुनते
मेघ- मल्हार छेड़ते
खेतों,कछारों चरोखरों की तरफ
इठलाते चल पड़ते
बाजे गाजे से मेघ
ठण्ड में —-
“दूब बिना- दूना सूना ” की टेक पर
छिछले उठती
पोर पोर दूर्वा
भर जाती गेहूं की बालियां और
” कुतिया की पीर
धनी कहे उससे छू लगा ” की
निर्मम चुटकीली बानी सुनते ही
तैश में सुर्ख हो जाते
गर्मी के दिन ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत)
नारक्या दाऊजी के व्यक्तित्व की खूबियां इतनी है कि लगता है ये कोई ढोर – डांगर चराने वाला नहीं वरन अपने समय और समाज से जंगल और मैदान और मवेशियों से परिचित, जुड़ा हुआ संबंध निभाता हुआ डूबा हुआ मनसुख है ।जिससे जंगल के पेड़ – पौधे अपनी पहचान करते हैं जंगल की वन संपदा और पेड़ों के औषधी के गुणों से वाकिफ नारकया ने अपने को जंगल की जानकारियों से भर लिया है ।जंगली पशुओं को वश में करना और उन पर अपनी आवाज का असर छोड़ना और अपनी मवेशी की रक्षा करना ।ये है अपने काम ,अपनी आजीविका ,अपने रोजगार में पूरी तरह डूब जाना ।इस तरह नारकया केवल अपनी मवेशियों को ही रक्षित नहीं कर रहा है वह अपनी शख्सियत से अपने इलाके की आजादी ,अपनी सत्ता के तीखे तेवर और मिजाज, का भान भी रखता है । उन्हें चकड़बो में फंसी लोमड़ियों के मंसूबे का अर्थ और पखेरु की चहक का अनुमान और अनुभव दाजी को खूब – खूब अच्छी तरह जानते थे । घातक आहटों के इशारे , गहरी गुफा और अंधी गलियों की भी भरपूर जानकारियां बहुत गहराई से थी ।शिकारियों की हत्यारी हरकतों से भी वे पूरी तरह से वाकिफ थे । संवेदनशील भी भरपूर थे जो चट्टानों से कान लगा कर झरनों के स्वर सुन सकते थे ।ये है नारक्या दाजी अर्थात दादाजी का संक्षिप्त रुप है दाजी । सागर से छक कर लौटे बादल को किसानिन का उपालम्भ सुनाकर उन्हें बरसने के लिए विवश कर देते थे ।कितना यथार्थ बसा है किसानिन की बात में — किस्सा कहानी दोहरा ,कछु न सीखें कंंत , हल हांकते जनम गयो , रचे बैल के दन्त ।” याने किसान ने कुछ भी पढ़ाई – लिखाई नहीं सीखी है ।बस जन्म से ही खेती – किसानी हल हांक के और बैलों के दांत गिनकर ही जनम बिता दिया है । अब यदि तुम भी नहीं बरसे तो मेरे कंंत ( पति ) का क्या होगा ? नारियां के यह बोल सुनकर बादल बरसने को मजबूर हो जाते थे ।गाजे – बाजे से मेघ मल्हार गाते खेतों में बरस पड़ते हैं ।इसी तरह ठण्ड में —दूब बिना – दूना सूना की टेक पर नन्हीं नन्हीं दुर्वा धरती को हरा भरा बनाने को अंकुआ उठती और गेहूं की बालियां भी दानों से भर उठती ।यह है शुभ भावना जो फलीभूत होती है प्रकृति में चारों तरफ ।कुतिया भी प्रसव पीड़ा से त्रस्त होती है ठण्ड के दिनों में और उसी समय यदि उसका मालिक उससे छू लगा करता है तो यह कितनी निर्मम और चोट पहुंचाने वाली ,दुख देने वाली बात है ? इस तरह की पीड़ा देने वाली बात सुनकर तैश में याने गुस्से से दिन लाल हो जाते हैं याने कुतिया की प्रसव पीड़ा को न समझ कर उसको दौड़ाने की स्थिति की कल्पना करना कितना अमानवीय है इस पर दिनों को भी गुस्सा आ गया और दिन का तापमान बढ़ गया ।याने ऋतु परिवर्तन हुआ और गरमी का मौसम आ गया । नारकया दाजी के व्यक्तित्व के पहलुओं से परिचित होते होते ऋतुएं बदलने लगी ।
