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चीजें-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
चीजें
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उनसे पूछा जाये
जो हर हाल में गवाह है मौत के
पूछा जाए उस बिस्तर से
जो बिछा रहा तक – सा
वे कुर्सी – मैजें वे अलमारियां
वे तमाम चीजें कभी थकी नहीं
फिर क्यों थक जाता आदमी ?
क्यों हर बार सही हो जातीं चीजें ??
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
चीजें जमा करना आदमी का एक शौक होता है और एक फितूर भी है एक मनोवैज्ञानिक रूप से अपने अस्तित्व को बड़ा दिखाने की चेष्टा भी हो सकती है ।चीजों को जमा करके आदमी यह भ्रम पालता है और यह धारणा भी मन में पाल लेता है कि चीजों से उसकी हैसियत का अन्दाज लग जायेगा ? हर बार चीजें बरकरार रहकर आदमी को छोटा कर देती है ।आदमी कहें या प्राणीमात्र की एक उम्र तय होती है ।उसका जन्मना जितना सुनिश्चित है उतना ही उसका दुनिया से रुखसत होना भी तय होता है ।आदमी अपनी हैसियत और व्यक्तित्व को निखारने में जितना ध्यान नहीं देता उतना वह चीजों को बटोर लेने उन्हें हासिल करने में अपना वक्त जाया करता है । यह एक मामूली धारणा है कि आदमी की हैसियत ,आदमी का कद ,आदमी की कद्र उसके आसपास फैली चीजों से , उपलब्ध सम्पदा से या धन – सम्पत्ति ,मकान , दुकान या कारोबार से नहीं वरन उसके आत्मिक गुणों के कारण होती है ।उसके बाद भी चीजें रहेंगी ।चीजें हर बार आदमी की मौत की गवाह होती है लेकिन चीजों में शख्सियत नहीं समाई रहती ? चीजें निर्जीव हैं ।बेजुबान हैं ? केवल स्थितियों और हालात के अनुरुप इस्तेमाल की जाती हैं ।जबकि आदमी पूरी जिन्दगी सामान सहेजने में ही बिता देता है । आदमी की प्राणी की मौत के बाद भी सामान वैसा ही व्यवस्थित बना रहता है और प्राणी सामान जुटाते जुटाते थक जाता है और एक। दिन हमेशा हमेशा के लिए विश्राम करने लगता है । इसीलिए उन जुटाए गये सामान से यह पूछा जाये कि वे किस उम्मीद से नहीं थकी? और प्राणी क्यों नाउम्मीद होकर थक गया ? चीजें बरसों बरस प्राणी मात्र के काम आती रही और आदमी चीजों को इस्तेमाल करके गुजरता गया ? यह विचारणीय बात है कि आदमी को अपने जीवन में वस्तुओं को उतना ही एकत्रित करना चाहिए जितनी जरुरत हो । यहां जैन धर्म का बहुत ही महत्वपूर्ण सिध्दांत ‘ अपरिग्रह ‘ ज्यादा वैचारिक मालूम पड़ता है ।जिन वस्तुओं की जीवन में कोई आवश्यकता नहीं होती मनुष्य उनको भी संग्रह करके रखता रहता है । उन्हें भी जोड़ता और जमा करता रहता है । यह समय का व्यर्थ उपयोग ही है ।चीजों से आदमी की पहचान नहीं होती यह धारणा व्यर्थ है ।।जिस तरह जीविका उपार्जन से धन की जरुरत पूरी की जाती है लेकिन जीवन भर केवल धन संग्रह करने में ही जीवन चर्या लगा दी जाए तो यह जीवन के महत्व को कम आंकना ही है । मनुष्य अपने जीवन का इससे अच्छा उपयोग भी कर सकता है ‌यह भी यदि मान लिया जाये कि संसार में अपने अस्तित्व को बनाए,और बचाये रखने के लिए धन , सम्पत्ति ,जमीन – जायदाद की महती भूमिका है तब भी यह जीवन का बेहतर उपयोग नहीं है ? वस्तुओं का अस्तित्व परिवर्तनीय है । आज किसी की और कल किसी ओर के नाम दाखिल हो जाती है । सच है वस्तुओं से ही पूछा जाना चाहिए कि उनके होते हुए भी आदमी क्यों थक जाता है ? आदमी के होने पर वे कभी क्यों नहीं थकती ।बिस्तर ,कुर्सी – मेज अलमारियां वैसी की वैसी ही यथास्थान जमी रहती है आदमी ही अन्दर बाहर होता रहता है ।आदमी वस्तुओं ,सामानों पर गर्व करता रहता है लेकिन चीजें कभी भी आदमी पर गर्व नहीं करती ? जीवन की वास्तविकता वस्तुओं, सामानों ,चीजों से नहीं होती उसकी वास्तविक कद्र ,उसकी हैसियत मनुष्य होने में होती है । मनुष्यता ही उसकी सच्ची पहचान है ।आदमी को अपने अस्तित्व का महत्व समझना चाहिए और सामानों की नकली दुनिया से बाहर आदमीयत के गुणों की असली दुनिया में एक मुकाम बनाना चाहिए ।यही उसकी सांसारिक यात्रा और वास्तविक पहचान है ।संसार की भौतिक जगत आदमी के पहले भी और उसके बाद भी बरकरार रहेगा । इसलिए परिग्रह की सही समझ पैदा करना ही सही हैसियत है याने गुण संपन्न होना ही परिग्रह का सही मायना है ।जीवन का सही अर्थ है ,गुण हीन का होना और न होना सब समान है । गुण संग्रह मनुष्य के अस्तित्व और अस्मिता दोनों की बेहतर स्थिति है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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