Home आज की कविताइतना तो हम कर ही सकते हैं-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

इतना तो हम कर ही सकते हैं-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
इतना तो हम कर ही सकते हैं
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इतना तो हम कर ही सकते हैं
कि आम को आम
और बबूल को बबूल ही कहें
इतना तो हम कर ही सकते हैं
कि जैसा चाहते हैं सबसे
वैसा हम भी रहें – सहें
इतना तो हम कर ही सकते हैं
कि सत्य संधान ,संज्ञान को छोड़ कर
चाहे जिधर न बहें
इतना तो हम सभी कर सकते हैं
कि आदमी को आदमी की तरह
अपनी बाहों में प्यार से गहे ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में बहुत सरल हो जाने की बात आदमी से कही गई है ।आदमी से ऋजुता की बात कही है ।यह ऋजुता क्या हो सकती है अहम् और अंहकार से मुक्ति ।याने आदमी को समाज के लिए क्या करना है अपने अंहकार को ,अपनी मिथ्या धारणाओं को ,अपनी नफरत और हिंसक वृत्तियों को छोड़कर बस सरल हो जाना है । संसार का सत्य क्या है ? संसार का स्वानुभूत संज्ञान क्या है ? मानवीयता ! मनुष्यता !! हम जैसा लोक व्यवहार अपने साथ चाहते हैं वैसा ही व्यवहार हम सबसे करें ।जिस तरह हम अपने लिए सम्मान और गरिमा का लोक व्यवहार चाहते हैं हम वैसा ही समाज के हर मनुष्य के साथ करें ।सबके साथ समान सहनशीलता का आपसी व्यवहार हो ।यदि किसी मनोविकृति से हम आहत हैं तो उस मनोविकृति को हम भी परस्पर व्यवहार में त्याग दें । समाज में जो सत्य सर्वकालिक स्थापित हैं उनकी मान्यताओं ,मौलिक विचार की पृष्ठभूमि , जो सार्वभौमिक सत्य प्रतिष्ठित है जो मनुष्य होने के मूल गुण और संज्ञान से अनुभूति है ,जो मनुष्य की चित्त वृत्तियो को आत्मा को और चेतना को जागृत करते हैं उन सत्यों का तिरस्कार करने वाली नफरत हिंसा की धाराओं में न बहें ।यह मामूली बात नहीं है ।यह बहुत ही गहरी बात है । हमारे एक मिथ्या विचार से हमारी संस्कृति की करुणा की धारा अवरुद्ध हो सकती है ? हमारा एक नफरत का विचार हमारी संस्कृति की उदार परम्परा को कलंक के काले धब्बों से भर सकता है ? इसलिए सिरफ एक छोटी सी ,मामूली सी ,साधारण सी , दिखने वाली बात है कि हम केवल अपने जीवन में अहिंसा के विचार का आचरण जोड़ लें ।अपने व्यवहार और आचरण में मनुष्यता के सभी व्यवहार ,प्रेम ,करुणा ,दया ,त्याग ,सेवा के मानवीय आचरण की राह पर चलें ।यही तो है आदमी को आदमी के गले लगाने के व्यवहार ।यही तो है गले मिलने की रवायतें । इसी से सभी त्यौहार लोकपर्व बन जाते हैं । यहीं से शुरुआत होती है उत्सव के उत्साह की ,उमंगों की , यहीं से आदमी से आदमी की परस्पर प्रेम की शुरुआत होती है ।बस आदमी को इतना ही तो करना है अपने नफरत ,घृणा,हिंसा के विचार को छोड़कर आदमी को आदमी के प्रेम के करीब आना है ।नफरत घृणा सार्वभौमिक, सार्वकालिक और सर्वजन हिताय नहीं होती ।प्रेम ही वह जीवन तत्व है जो समाज की अन्तर धारा में स्पन्दन की तरह प्रवाहित होता रहता है । अपने समाज की बेहतरी के लिए हम नफरत के विचारों को ,घृणा की बातों को और आपसी भरोसे को ,विश्वास को संशय और संदेह के दायरों में धकेल देने के हिंसक घटनाओं के दरम्यान आदमी को पटक देने के माहौल को केवल प्रेम ,विश्वास,भरोसे पर फिर से एक सृजन भरी धुरी दे सकते हैं बस इतना साधारण सा आचरण ही मानव समाज को अहिंसा से हरा भरा बना सकता है । बस इतना सा अपनी हिंसक वृत्तियो को बदल लेने का काम ही तो करना है मानव समुदाय की बेहतरी के लिए ।आदमी आदमी को गले मिलना है ।ईद की तरह ,होली मिलन की तरह । मनुष्य मनुष्य के बीच सहनशीलता और सहानुभूति पैदा करना है ।समाज के हर आदमी को हर आदमी से प्रेम करना है । बस इतना ही तो करना है आदमी को आदमी के लिए । हमारी वैचारिक समझ और बोध हर हमेशा सत्य के साथ रहे ,हमारा इतिहास बोध कभी भ्रमित न हो ।यही है आदमी के हक में आदमी का साथ खड़े होना । 🙏 विनीता रघुवंशी

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