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ल ‘ लहर का
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ल लड़के का
ल लड़की का
ल लहर का सिखाते हुए
दूर से हिंसक भीड़ की आवाजें सुनी
तो वह ल लहू का पढ़ाने लगा
वह कुछ सोचे इसके पहले ही
हत्यारी लहर पल्लरें मारती आई
और रंग गई टाटपट्टिया लहु से
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता हमें शिक्षा के मूल विचार की बुनियाद के नजदीक लेकर आमने – सामने खड़ा कर रहा है ।शिक्षा का बुनियादी विचार है भय मुक्त समाज की संरचना करना ।आज की शिक्षा प्रणाली जिस ओर उन्मुख है उस तरफ हिंसा और भय की शिक्षा का आशय समझाया जा रहा है ।लिंग आधारित शिक्षा और मायने तो है ही लेकिन जब शिक्षा पर हिंसा का दबाव हो जाए तो वह शिक्षा समाज के लिए निरापद नहीं रहती । शिक्षा का मूल उद्देश्य ही है भय मुक्त समाज ।जो शिक्षा मनुष्य की चेतना को भयग्रस्त करती है ,जो शिक्षा मनुष्य के मन को लालच से भर्ती हैं ,जो शिक्षा मनुष्य को लोभ और स्वार्थ जैसे विकार से ग्रस्त कर समाज को भ्रष्टाचार की ओर धकेलती है ।ऐसी शिक्षा प्रणाली हर समय प्रश्नात्मक होती है ।’ल ‘ लड़की और ‘ल’लड़के का तो फिर भी ठीक है ये ‘ल’ की ध्वनि और अक्षर सीखने का जरिया हो सकते हैं । लेकिन जब ‘ल’ लहू के रुप में सिखाया जाये तब वह हिंसक शिक्षा का माध्यम बन जाता है ।क्या हम शिक्षा को हिंसा के साथ तालमेल बैठाने के लिए जरिया बना रहे हैं ? यह विचारणीय प्रश्न है ।इस पर शिक्षा ,समाज,बौध्दिक चेतना सम्पन्न ,और शिक्षकों को विशेष विचार करना चाहिए ।शिक्षा के उद्देश्य के भटकाव पर भी नियंत्रण और निगाह रखनी चाहिए ।वैसे देखा जाए तो शिक्षा देने का दायित्व समाज का ही होता है ।राज्य और प्रशासन तो केवल अनुदान,आर्थिक सहायता ,भूमि – भवन , इमारतों की,संसाधनों की व्यवस्था ही करना चाहिए । पाठ्यक्रम की दिशा और दशा स्वायत ही होना चाहिए ।यदि शिक्षा राज्य या सरकार के दायित्व – दायरे में आती है तो उसके विकृति के बहुत सारे आयाम जुड़ सकते हैं ।शिक्षा में भेड़ चाल सी गति,माफिया,अपराध समूह,क्रय- विक्रय के हथकण्डे सबके सब चालू होकर स्तर हीन शिक्षा का माध्यम बन सकते हैं ।कोरे कागजी प्रमाण पत्र योग्यता के आधार होंगे और शिक्षा की वास्तविक स्थिति ,कौशल , प्रतिभा का दोहन – शोषण और पलायन ही होगा । प्रतिभा का पलायन एक अच्छे आदर्श राज-व्यवस्था को आघात पहुंचाता है ।शिक्षा और शिक्षक का भय मुक्त होना बेहद जरुरी है ।भय से ग्रस्त शिक्षक सिर्फ हिंसा ,भय, लोभ , प्रलोभन,लालच और सत्ताभिमुख चाटुकारी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सिखा सकता ।शिक्षक ही शिक्षा का वह माध्यम है जो मनुष्य में दृढ़ता पूर्वक सत्य,न्याय , कर्तव्य परायणता, निष्ठा , देशभक्ति का वैचारिक आचरण प्रतिष्ठित कर सकते हैं । अन्यथा’ ल’ लहर का सिखाते हुए शिक्षा में भी हिंसा और भय की लहर उठने लगेगी ।शिक्षक की निष्ठा और सत्य भी लहर की चपेट में आ जायेंगे और समाज का बुनियादी ढांचा ध्वस्त होकर रक्त रंजित हो जायेगा ? क्या हम शिक्षा के माध्यम से समाज में हिंसक माहौल रचना चाहते हैं ? यदि शिक्षा हिंसक हुई तो समाज में रक्त की उठती लहरों को कोई भी रोक नहीं पायेगा ।समय रहते सजग होना बहुत जरूरी है। शिक्षा भयभीत नहीं निर्भय करती है ।शिक्षा लालची नहीं परिग्रह मुक्त करती है ।आज वर्तमान समय में शासन के अधिकारी और कर्मचारी जिस तरह के भ्रष्ट आचरण से लिप्त हैं समाज की यह दुरावस्था है जहां शिक्षा ने समाज के स्तर को गिराया और लज्जाजनक स्थिति तक पहुंचा दिया ? यदि शिक्षित समाज का यह चेहरा भ्रष्ट हैं तो हमें शिक्षा पर पुनः विचार करना होगा ? शिक्षा का मूल उद्देश्य तो समाज में ज्ञान ,शोध, विचार , सत्य,न्याय और निष्ठा के सही आचरण स्थापित करना है फिर यह भ्रष्ट आचरण ? ‘ल’ लहर का ही हो पर अहिंसा की लहर हो ।निर्भयता की लहर हो ।ल लालच का नहीं हो ।शिक्षा सिखाने का माध्यम है तो अहिंसा ही सिखाई जाये भय से हिंसक तौर तरीके न सिखाए जाए ।शिक्षक समाज की रीढ़ है और हमेशा रहेगा ।समाज शिक्षक की निष्ठा को कभी कम न आंकें ? शिक्षक की योग्यता और प्रतिभा के प्रतिमान और प्रमाण होते हैं छात्र ।
विनीता रघुवंशी
