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अन्तर की ऊर्जा
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उस वक्त मोम का पिघल कर
मोम में ही मिल जाने जैसा
कुछ होने लगता है मेरे भीतर
संयम को काफी पीछे छोड़
कितनी – कितनी बार
पाट देते उस क्षण
अपनी ही प्रतीतियों के धरती आकाश हम
तब मैं पूर्ण पुरुष हो जाता हूं
जब तुम उलीच देती हो
अन्तर्लय का आनंद स्रोत
और सुध -बुध खोये
गुलाब की पांखों से खोजने लगती हो अमृत
मेरे ओंठों पर !।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
प्रेम मनुष्य की अन्तर ऊर्जा है ।यदि मनुष्य को प्रेम ना मिले या वह किसी से प्रेम ना करें तो जीवन व्यर्थ है ।स्मशान समान है । जहां सब तरफ मायूसी और एंकरस शान्ति ही होती है । ना जीवन में उत्साह ना जीवन में उमंग ? जीवन नीरस और निराशा से भरा हुआ । मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी प्राणी से ,किसी न किसी जीव से प्यार और लगाव अवश्य रखता ही है ।यही मनुष्य जीवन की वास्तविक प्रामाणिकता होती है ।संसार में प्रेम ही वह जीवन धारा है जिसके होने पर या बल भरोसे आदमी ,प्राणी मात्र अपना जीवन व्यतीत कर लेता है ।यदि मनुष्य के जीवन में प्रेम का तत्व न हो तो मनुष्य विक्षिप्त, चिड़चिड़ा, गुस्सैल, तनाव ग्रस्त , और हिंसक मनोवृत्ति से घिर जायेगा । मनुष्य की अन्तर धारा को मानवीय बनाए रखने के लिए प्रेम की ऊष्मा का होना बेहद जरुरी है ।प्रेम ताप है ।यह भोग नहीं ।यह मनुष्य के लोक व्यवहार का तरीका है । यद्यपि समाज व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए सभी धर्मों में विवाह पध्दति से गृहस्थ जीवन की शुरुआत मान्यता रखती है । यह स्त्री और पुरुष के बीच में यौन संबंधों को समाज स्वीकृत प्रथा है । विवाह एक संस्था है जो मनुष्य को नैतिक और मानवीय मूल्यों से युक्त जीवन शैली के अनुकूल और अनुशासित रहने का सलीका सिखाती है ।इस तरह का यौनिक संबंध हर जीव जन्तु पेड़ पौधे भी अपनी प्रजाति की वृध्दि के अनुरुप व्यवहार में लाते हैं ।इन सबमें मनुष्य एक बुध्दिमान प्राणी है जो काम भावनाओं को भोग में तब्दील करता है अन्यथा जीव मात्र केवल प्रजनन ,प्रजाति वृध्दि के अनुसार जैविक जीवन अपनाते हैं । मनुष्य इस तरह की काम भावनाओं को भले हेय दृष्टि से देखता हो लेकिन वास्तव में प्रेम का भौतिक स्वरुप तो यौन उत्तेजना और संबंध की चेतना पर ही निर्भर होता है ।जब यह प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच ता है तो यह करुणा ,फिक्र ,चिन्ता , संवेदना ,त्याग ,दया ,अहिंसा से परिपक्व हो जाता है । मनुष्य स्व से निकल कर परमार्थ के लोक हित कारी चिन्तन से जुड़ जाता है । प्रेम फिर खुद से खुद की सीमा में बंधा नहीं रहता यह असीम हो जाता है । यह प्रेम का लोक व्यापी रुप है जो मनुष्य को निस्सीम आकाश के प्रकाश से और धरती की हरितिमा से परिपूर्ण कर देता है । मनुष्य की चेतना का प्रेम मय हो जाना ही विस्तार की लोक चेतना है । यही अन्तर लय है ।यही आत्मा का अनसुना संगीत है ।यही आत्मा का भींगना है ।प्रेम ही वह स्वर है जो मनुष्य की आत्मा का नाद है ।यही ब्रह्म है । प्रेम की अनुभूति और अनुभव ही तो मनुष्यता का प्रमाण है ।जिसमें प्रेम की बेखुदी नहीं वह खुद की गिरफ्त में कैदी हैं । यदि प्रेम का अहसास है तो वह काम भावनाओं के प्रामाणिक अनुभव का साझीदार भी है और करुणा की अनुभूति से संपृक्त वाल्मिकी ऋषि के प्रथम श्लोक का रचयिता पल क्षण का साक्षी भी है ।प्रेम ही वह करुणा विगलित भाव भूमि है जहां मनुष्य अपने चिर आनंद में डूबा साधक है । समग्र जीवन में मनुष्य की साधना केवल प्रेम ,लगाव और प्यार को महसूस करना चाहती है जिसके लिए किसी के प्रति समर्पित होना होगा ।किसी को अपना बनाना होगा ।इस गीत की तर्ज पर जिन्दगी बिताना होगा —“ये जिन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया ,प्यार ही में खो गया ” अपने खोने के अहसास को महसूस कीजिए ।अपनी अन्तर लय की ऊर्जा को समेटिए ।बस जिन्दगी गुजार दीजिए ।बाकी सब लोकाचार है ।लोक व्यवहार है । यह संसार की माया है यहीं रह जानी है । सो टका तो प्यार है जो केवल एक मर्तबा ही होता है । खरी और असल दौलत तो प्रेम ही है जो आदमी कभी बिल्ली से करता है ,कुत्ते से करता है ,गाय और घोड़े से भी करता है और जिस पर मन आ जाए उससे लगाव रखता है उसकी फिक्र पालता है ।काम भावनाएं भले हेय समझी जाती है लेकिन हर प्राणी की अन्तर ऊर्जा तो वह है ही ।इसे सच समझें या झूठ ।इसे चाहे इज्जत से जोडिए या नाक का सवाल बना लीजिए । चाहे आनर किलिंग कीजिए ।पर इसके बिना जीवन निस्सार है ।हर प्राणी अपने नियम – संयम का पालन करके अपने काम और राम का अनुचर बना रहता है ।
विनीता रघुवंशी
