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वे शब्द ही हैं
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वे शब्द ही हैं जो जन्मते संगसाथ
ध्वनियों की कोख से
वे शब्द ही हैं जो खेलते नंग – धड़ंग बच्चों से
अर्थों के समाज में बेझिझक
वे शब्द ही हैं जो अर्थ छवियों के साथ
उठाते अनगिनत लहरें सोच सिन्धु में
वे शब्द ही हैं जो हिज्जे करते ही
मारे खुशी के उछलते रहते देर तक जहन में
वे शब्द ही हैं जो चांद सूरज तारे बने
निखारते आसमान की नीलिमा
और बनते घुप्प रात में जुगनू की चमक
वे शब्द ही हैं जो धूप हवा पानी बनकर
उलटते – पलटते धरती की सौंधी गंध
और परसर्ग बने जोड़ते सार्थक सम्बन्ध —-
कण – कण से ओर – छोर – वे शब्द ही हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में शब्द के भीतर छुपी शक्ति और चेतना के विभिन्न रुप को उजागर किया गया है ।शब्द उम्मीद है ,सपना है ,कामना है ,चेतना है ।शब्द ब्रह्म हैं ।शब्द अन्न है ।शब्द जगत है ।शब्द प्राण है ।शब्द में अकूत सामर्थ्य है ।वह मृत को जीवित कर सकता है और जीवित को मृत समान कर सकता है ।शब्द आशा है शब्द निराशा है ।शब्द उत्साह है और शब्द ही मायूसी है ,उदासी है ।शब्द क्रोध है शब्द शान्ति है । शब्द राग है शब्द विराग है ।क्या नहीं है शब्द में ? शब्द मानव मन की अभिव्यक्ति है ।मन की चंचलता और स्थिरता है । शब्द ध्वनियों का समुच्चय है ।बिना ध्वनि के शब्द का कोई अस्तित्व नहीं । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शब्द मय है ।सारी धरती प्राणीमात्र की ध्वनियों के समागम से सृजित शब्दों का भण्डार है । मूक भी वाचाल है अपनी अभिव्यक्ति में और वाचाल भी कभी कभी शब्द हीन है ।यह सारा संसार शब्द मय है । यहां वस्तुएं हैं और वस्तुओं को व्यक्त करने के लिए प्रतीक हैं ।शब्द रुप हैं ,पर्याय हैं एक शब्द के लिए अनेक शब्द प्रचलित हैं ।शब्दों को हिज्जे करके पढ़ने के अपने ढंग और तरीके हैं । शब्दो के मायने भी भांति भांति के हैं । शब्द खगोल – भूगोल में सर्वव्याप्त हैं ।शब्दों के इन्हीं रुप वैभिन्न के कारण विश्व में अनेक भाषाओं और बोलियों का उदय हुआ और कुछ बोलियों और भाषाएं अस्त भी हो गई ।यह सब भाषा में समाए शब्दों के खो जाने या आकर मिल जाने के कारण हुआ । मनुष्य एकमात्र प्राणी है जो ध्वनियों के उच्चरित रुप को भाषा की संज्ञा देता है । मनुष्यों के अलावा पशुओ ,पक्षियों और जीव मात्र के पास ध्वनियां तो है लेकिन उनके पास शब्द में ढाल लेने की सामर्थ्य वाली वाणी की शक्ति नहीं है । इसलिए उनकी अभिव्यक्ति निर्मूल होती है । मनुष्य अपने विचार को भाषा में शब्दों के जरिए व्यक्त कर सकता है । इसलिए मनुष्य के प्रेम,त्याग,करुणा , संवेदना ,चेतना ,दया आदि भावों की अनुभूति शब्दों में ध्वनित होती रहती है । मनुष्य के सभी विचार और सहृदयता का प्रकट स्वरुप शब्द ही होते हैं ।शब्द कण- कण में विश्व के ओर – छोर में सर्वव्यापी है ।शब्द के बिना संसार की कल्पना भी संभव नहीं ।संसार है ।जगत है । ब्रह्माण्ड है तो शब्द भी हैं । मनुष्य की सभी भावनाओं की अभिव्यक्ति शब्दों में ही होती है ।शब्द दावानल हैं शब्द अंधकार हैं शब्द उजाला है शब्द प्रकाश है । शब्द ज्ञान है और शब्द ही जड़ मूर्खता भी है । शब्द के अस्तित्व के साथ संसार का भौतिक स्वरुप बंधा है । शब्द में ही भौतिक जगत निर्मित है और लय भी है ।शब्द आत्मा है ।शब्द अनुभूति है ।शब्द अहसास हैं । शब्द उल्लास हैं । शब्द उत्साह,जोश और जूनून है ।क्या शब्द हीन जगत की कल्पना संभव है ।संसार की समस्त गतिविधियों में समस्त हलचलों में शब्द समाया हुआ है ।शब्द शून्य जगत की कल्पना भी संभव नहीं है ।आदमी पंगु हो सकता है ,गूंगा हो सकता है ,बहरा हो सकता है लेकिन विचार शून्य नहीं हो सकता ।शब्द ही विचार हैं ।यह जगत सत्य है । यही सत्य शब्द है ।
विनीता रघुवंशी
