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हूजूर और मैं
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आपका जवाब नहीं सरकार
क्या कमाल की तकरीर करते हैं आप !
पिछले वाले हूजूर तो गों-गों करते थे
आप गजब के दरियादिल हैं अन्नदाता
पिछले वाले तो एक चुल्लुभर थे
आप जब चलते हैं तो चलते ही जाते हैं गरीब नवाज़
पिछले वाले तो हर पांच कदम पर धच्च धच्च बैठते थे
कमाल की अपान वायु छोड़ते हैं जहां पनाह
कि आपके पीछे धरती की सौंधी सौधी गंध
दासी की तरह चलती है
पूरे जहान में आप ही तो अकेले हैं मर्द
बाकी तो ताली पीटने बस्ते हैं
और पिछले वाले हूजूरों की तो
डाक्टरी रिपोर्ट भी खराब थी
आपका जवाब नहीं ,आपका मुकाबला नहीं
हां सरकार मैं एक नये तजुर्बे से कह रहा हूं
खुदा की कसम आप लाजवाब हैं
आप चौदहवीं का चांद हैं
आप आफताब हैं !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में हूजूर बनाने वाले उस “मैं ” याने उस जन का चरित्र उजागर हुआ है जो सत्ता की चाटुकारी और चापलूसी करने में महारत रखता है । हर बार वह पिछले की खामियां बताता है और वर्तमान जन प्रतिनिधि को भरपूर सक्षम बनाता है ।यह पूर्णता के मानदण्ड भी कितने स्तर हीन और छिछले हैं कि जनप्रतिनिधि की निजता को भी सब के सामने खोल दिए जाते हैं ? यह निजता यौनिक से लेकर अपानवायु तक में तुलना के सतह को छू लेती है ।सामान्य जन खुदगर्ज है और चापलूसी में सभी को पछाड़ता हुआ । जन प्रतिनिधि अन्नदाता है , जहां पनाह है , गरीब नवाज़ है ,चांद हैं चौहदवी का ,आफताब है ।यह है सामान्य से खास हो जाने की हूजूर बन जाने की पूरी प्रक्रिया ? यह मैं अकेले होते हुए भी बहुत सारे चाटुकार का चापलूस का प्रतीक है ।अवाम खुद उस राजसी वैभव को अपनी दासत्व की ,गुलामी की ,मिथ्या प्रशंसा की आदतों से बाज़ नहीं आती ।उसे हर जन प्रतिनिधि ,हर सत्ताधीश ,हर सत्ता प्रमुख हूजूर लगता है ।वह राजा ही होता है ।वह बादशाह हैं ।वह शहंशाह है ।शाहों का शाह है । जनता केवल प्रजा है ।यह लोकतंत्र का बदलाव राजतंत्र में बदलने का तरीका है ।आदमी केवल सजावट में खड़ा दरबारी बन कर खुश हैं ।वह सत्ता का नियंत्रक ,नियामक नहीं होना चाहता है ।वह हर मर्तबा अपने को अयोग्य,अक्षम, और प्रतिभा हीन ही महसूस करता है ।वह जन प्रतिनिधि या सत्ता को चुनकर उससे अपने को अलग और अलहदा कर लेता है ।यह अलग – थलग हो जाने की मन: स्थिति ही जनता पर एक हूजूर का अवतरण कर देती है और जनता अपने लिए न्याय ,शिक्षा ,और स्वास्थ्य के मसलों पर सरकार और प्रशासन ,अधिकारी की दया पर निर्भर और आश्रित हो जाते हैं ।जबकि ये तीनों मसले जनता कि जिन्दगी के साथ जुड़े अहम मसले होते हैं । शिक्षा कैसी होनी चाहिए यह विचार करने का दायित्व समाज चिन्तकों का है ।न्याय सबके लिए समान और व्यय शून्य होना चाहिए ।समाज के हर व्यक्ति को बेहतर सेहत और स्वास्थ्य परीक्षण का दायित्व सरकार का होना चाहिए ।यह सब मसले सरकार बने हूजूर के होते हैं लेकिन समाज में जन जन में बैठी जी हूजूरी की आदत और चेतना जनता को प्रजा में तब्दील कर देती है ।सरकारी खजाना सत्ता प्रमुख के ऐशो आराम और सुख सुविधा मुहैया कराने में ही खर्च हो जाता है ।जनता के हक में कर से जुटाया राजस्व खर्च ही नहीं किया जाता ।जनता कहीं पेयजल के लिए तरसती है तो। कहीं चिकित्सालयों के अभाव में दम तोड़ती है । कहीं स्कूल और कालेजों के अभाव में अपढ़ या शिक्षा से वंचित रह जाती । कहीं सड़क न होने के कारण गांव से शहर का सम्पर्क नहीं रह पाता ।ये सब जनता की तकलीफ़ हूजूर को नहीं दिखती ।वे चापलूसों और चाटुकारों की झूठी प्रशंसा में आत्म मुग्ध बने दुनिया के सबसे श्रेष्ठ जन नेता में अपनी छवि को गढते रहते हैं । यह आत्म मुग्ध अवस्था जन जन की ही प्रेषित की गई होती है ।हूजूर की आत्म मुग्ध दशा से बाहर लाने का उपक्रम भी जनता को ही करना होता है । इससे जनतंत्र में जिस तरह धनतंत्र का बोलबाला है उससे मुक्ति मिलेगी । विधायक या सांसद से सीधे जनता को ही सवाल पूछने चाहिए , उन्हें हूजूर नहीं जनता का कर्मचारी समझा जाना चाहिए ।यदि वे जनता की तकलीफ़ ,पीड़ा ,संघर्ष ,कठिनाई में हाजिर नहीं तो वे जन प्रतिनिधि भी नहीं ? यह है जन प्रतिनिधि की हैसियत ।यह है जन प्रतिनिधि की औकात । यह है जन प्रतिनिधि का दायित्व ? क्या हम सब इस तरह विचार करते हैं अपने जन प्रतिनिधि की छवि के विषय में ? यह संवैधानिक पद है संवैधानिक दायित्व है ।जिसे जनता के हित में इस्तेमाल किया जाना चाहिए ।जबकि आज वर्तमान में जन प्रतिनिधि हूजूर बने अपना स्वांग रचते रहते हैं । जनता को अपना स्वभाव और आदत बदल लेनी चाहिए ।अपना नजरिया भी बदलना होगा ।
विनीता रघुवंशी
