Home आज की कविताबोलो तैयार हो कविता-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

बोलो तैयार हो कविता-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
बोलो तैयार हो कविता
*******************
तुम आई तो मैंने
खिड़कियां तक खोल दी
रोम – रोम से छलक पड़ा उत्साह
जगमगा उठा घर
ऐसे में दबे पांव काली बिल्ली की तरह
नहीं घुसेगी तेज रोशनी में मौत
आओ ! अपने खुले संसार में
कुछ रचना कर लें हम
कि जिनकी पहली शर्त
हरेक अनुभूति को हासिल करने के सुख हो
यह तभी होगा जब हमारे
एक दूजे की तरफ रुख हों
बोलो ! तैयार हो कविता !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता हृदय से सहृदय हो जाने की अनुभूति से परिपूर्ण है ।यही तो है संवेनात्मक ज्ञान ।यही है महावीर स्वामी और चौबीस तीर्थंकरों की तपस्या का संचित ज्ञान।यही तो है गौतम बुध्द का तथागत हो जाने का भाव । कविता का आना याने संवेदना की वह अनुभूति जो केवल ज्ञान का अनुभव है ।कविता तब ही आयेगी जब आत्मा में करुणा का अहसास होगा ।कविता सामान्य कर्म नहीं है ।कविता का आना सहज अनुभूति नहीं है ।जब तक मन में संवेदना ,करुणा ,ममता ,दुख ,कष्ट का अनुभव और पर पीड़ा की अनुभूति नहीं होगी तब तक कविता की भाव भूमि नम नहीं होगी परदुख कातरता की अश्रु धारा नहीं बहेगी तब तक कविता का बीज फलेगा फूलेगा नहीं ।लय नहीं होगी ,छ्न्द नहीं होगा ,बंधन नहीं होगा ,भाव धारा नहीं होगी ,करुणा का गान नहीं होगा , मनुष्यता का मान नहीं होगा ।कविता ऐसी उर्वरा धरती पर ही अपने आपको व्यक्त करती है ।कविता का खुले संसार में आना ही तो मन की उन्मुक्त अवस्था है ।वैचारिक खिड़कियां कविता के लिए बिल्कुल खुली होनी चाहिए ।मन में यदि कोई कुण्ठा है ,कोई ग्रन्थि है , कोई विकार है ,तो फिर कविता के लिए वह अनुकूल परिस्थिति नहीं है ।कविता तो निरभ्र मन की अभिव्यक्ति है । उदार मन ,उदार आत्मिक शांति के अनुकूल वातावरण में कविता निष्प्रवाह बहती है ।जब मन और आत्मा में ज्ञान का प्रकाश होगा , तेज उजाला होगा तब मृत्यु का दबे पांव आना संभव नहीं ।तब अमरता का राग होगा ।अपरिचय नहीं परिचय की चेतना समाज में प्रसारित होगी ।नफरत मृत्यु है और प्रेम दीर्घ जीवन ।प्रेम का सर्वव्यापक रुप के परिचय से ही परिचित हो जाना ही तो ज्ञान है ।यही तो संवेनात्म ज्ञान की परिपक्व अनुभूति है ।यही तो प्रवचन है । यही वचन भी है ।यह प्रेम रुपी जो संभाषण है ,संवाद है वही कालजयी है । प्रेम कालजयी है और नफरत क्षणिक तामसिक विकार है । वैचारिक खुलापन कविता की सहृदयता का प्रकट स्वरुप है ।कविता और मनुष्य का रुख एक होना चाहिए ।याने मनुष्य के मन की दिशा करुणा की दृष्टि से परिपूर्ण हो और कविता तो संवेदना की आत्मजा होती है ।उससे करुणा की दूरी हो ही नहीं सकती । आज का मनुष्य विकास , विज्ञान , वैश्विक मानव बनने की चाह में अपने मनुष्य होने के भाव – स्थितियों को छोड़कर क्रूरता , बर्बरता ,हिंसा की दिशा में बढ़ चुका है ।यही तो है मौत का काली बिल्ली की तरह दबे पांव आना लेकिन जब मनुष्य आत्मज्ञान के तेज उजाले में रहेगा ,ज्ञान चक्षु खुले रखेगा , अपने मानवीय पक्ष के प्रति सजग,सचेत,और सतर्क रहेगा तब वह कविता का स्वागत चेतना के साथ करेगा ।चेतना मर्मस्पर्शी,करुणा विगलित, संवेदना से परिपक्व और चिन्ताकुल होगी ।आज का मनुष्य संरक्षण के प्रति लापरवाह और समाज घातक बना हुआ है ।उसकी अनैतिक भावनाएं विकृत समाज को स्थापित कर रही है । जो कि कविता की संवेदना की जमीन की उपेक्षा ही है ।नफरत से पका सामाजिक माहौल संवेदना के लिए प्रतिकूल स्थितियां ही रचता है । समाज का हिंसक विचारधाराओं में बहना कविता के लिए दरवाजे बन्द करने जैसा है । कविता सहृदय की चेतना का बचाव ही है ।समाज में करुणा का प्रवाह बना रहना चाहिए ‌।तब ही कविता भी लिखी जाती रहेगी ।वाल्मिकी भी बनते रहेंगे ।वाल्मिकी ऋषि का करुणा से उपजा पहला श्लोक हर समय रचा जाता रहेगा ।कविता को हर समय संवेदनात्मक ज्ञान के प्रकाश को समाज में फैलाते रहने के लिए तैयार ही रहना होगा ।
🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More