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चुप क्यों हो कविता
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बहुत दिनों बाद आई
क्या सैर सपाटे पर हो आजकल !
कोई आदमी – वादमी भी मिला
या यूं ही घूम रही हो ?
बोलो – बतियाओ चुप क्यों हो कविता ?
अभी तो ऐसा है कि
मेरे जैसे तुम्हें जानते हैं
कल जब बदलेंगे पेड़ों के चेहरे
और हम अपनी शक्लें भी नहीं पहचान पायेंगे
उस वक्त यदि कम्प्यूटर के हवाले कर दी गई
तो क्या होगा तुम्हारा ?
बदलाव के कोहरे में चीजों के साथ
धब्बा भर होकर रह जाता है संवेदनशील परिवेश
और मोतियाबिंद के इलाज को निकले लोग भी
समाज जाते धुन्ध में
बहुत दिनों बाद आई
बताओ कि कहां कहां देखी तुमने
अंगारों – सी धूप ,हड्डी तोड़ ठण्ड ,मूसलाधार बारिश ?
सिकुड़ कर मत बैठो गुमसुम
कुछ बात करो कविता चौपालों पर ?
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
वर्तमान समय बिजनेस का समय है ।व्यापार का समय है ।आर्थिक जगत की उन्नति का समय है ।कार्पोरेट की दुनिया की चकाचौंध से यह संसार जगमगा रहा है ।सत्ता भी मुट्ठी में है धनपतियों की । कम्प्यूटर ने सारे संसार को अपने डाटा में बदल दिया है ।यह सब सच है भौतिक जगत का ।यह हकीकत है व्यापार बनी राजनीति की । एक कृत्रिम और बनावटी दुनिया में हम सांस ले रहे हैं । जहां पूरा संसार एक डाटा बना है ।एक आंकड़ा भर है । लेकिन साहित्य एक ऐसी वास्तविक जीवन रुप है जहां बुध्दि और विवेक आज भी निर्णय के लिए सक्रिय रहते हैं । जहां भावनाओं का मूल्य आज भी बचा हुआ है । साहित्य इस बदले हुए माहौल में हृदय के भीतर एक सहृदय व्यकि की तलाश में जुटा है ।कविता आज” ए आई” के हाथों में पढ़ी ,समझी और रची जा रही है । यह एक वर्जन है ।यह आदमी नही न ही वादमी है ।यह तो कोरा मशीनी चिप है जिससे युध्द लड़े जा रहे हैं ,कविता लिखी जा रही है ।यह यंत्र मानव मानव मन की विकृतियों का खुला बयान भर है । मनुष्य जो काम ,जो मनोविकार समाज को नुक्सान पहुंचाने के नहीं कर पायेगा वह सब यह रोबोटिक मानव के जरिए से हो जायेगा ।यह यंत्र मानव इतना समाज घाती है कि दुनिया के अमीर देश आज इसके माध्यम से विश्वयूध्द जीतने की मंशा बना रहे हैं और बचकाना हरकतों से जीत की प्रतिस्पर्धा रच रहे हैं ।ऐसे प्रतिस्पर्धा के युग में मनुष्य की लोक मंगल की भावनाएं और लोक-मंगल की चेतना का क्या हाल होगा ? यह विचार का विषय है । आज कविता कमरों में बैठ कर न लिखी जा सकती है न पढ़ी जा सकती है ।ना समझी जा सकती है ? आज कविता का दायित्व बढ़ गया है । कविता को सहृदय वातावरण रचने के लिए कमरों से ,अध्यापन कक्षों से, पाठ्यक्रम के दायरों से ,सभा कक्षों से , पुस्तकों – किताबों के दायरों को तोड़कर – छोड़कर चौपालों पर संवाद के लिए आना होगा ।चेतना के संचरण का दायित्व कविता पर बढ़ गया है ।कविता याने साहित्य के सभी रुपों को समाज के बीच अपने को प्रसारित करना होगा ,अन्यथा मनुष्य अपने विकार , कुण्ठाओं , भ्रान्तियों , वहमों ,ग्रन्थियों में उलझा हुआ समग्र संसार को मनोविकारों से भर देगा । जहां आत्म विस्तार और विरेचन नहीं होगा । मनुष्य के पास आनंद नहीं केवल रुदन ,पछतावा, हाहाकार , विक्षिप्त अवस्था, एकाकी पन , अवचेतन कुण्ठाए भर होंगी । क्या हम ऐसा आधा – अधूरा , रुदन मय संसार की ओर बढ़ रहे हैं ।संसार से आनंद , उत्साह,उमंग,जोश ,साहस सब विदा हो चुकेंगे और बाकी रहेगा मनुष्य के पास संताप ,विकृति , पश्चाताप ,चीत्कार ,चीखें ? यह सब हो उसके पहले समाज में साहित्य का महत्व स्थापित करना होगा ।कविता को बातचीत करनी होगी ।कविता का गुमसुम होना चिन्ता का विषय है ? कविता की उपेक्षा ,साहित्य की उपेक्षा मनुष्य को सबसे भारी नुक्सान पहुंचायेगी ।कलाएं समाज के उन्नयन का प्रमाण होती है । कलाओं का विसर्जन समाज का अमानवीय हो जाना है । क्या कविता या साहित्य की चुप्पी यह नहीं दर्शा रही कि हम कितने करुणा शून्य हो चुके हैं ? हमारा समाज कितना असंवेदनशील हो चुका है ? हमारा समाज क्रूरता की दिशा में अग्रसर है ? हम नफरत को कितना उभार रहे हैं ? हमारे भीतर प्रेम कितना घट गया है ? कविता की चुप्पी यह भी दर्शा रही है कि वह मनुष्य की सहृदयता घट जाने से विस्मित और हतप्रभ हैं ? कविता हताशा में सहृदयता के लिए भटक रही है ? आज वर्तमान समय में आदमी की ही तलाश की जाना चाहिए ? क्या हम यंत्र बन चुके हैं ? विचार और खोज तो इस पर भी होना चाहिए ? हमारे मन – मस्तिष्क में सब कुछ सेट हो चुका है ।रत्ती भर भी आदमी उससे मुकरना नहीं चाहता ? यह सब एक यांत्रिक कृत्रिम स्थिति है विचार तो इस पर भी आदमी को करना होगा ? कविता को अपने दायरे बदलना होंगे ? तब ही सहृदय मानव का सृजन होगा । कविता संवाद शैली में है ।कविता से तात्पर्य यहां सभी भाषाओं , बोलियों के साहित्य से है ।कविता साहित्य के व्यापक संदर्भ में प्रयोग की गई है । इसलिए रुढ़ार्थ में इसे अर्थ प्राप्ति के लिए ना लिया। जाये ना समझा जाये ।
विनीता रघुवंशी
