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हत्यारी आंधी के बाद
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दूध दुहते वक्त अचानक
गाय के नीचे दब गई धनिया
पंख भर छितरे हैं
जाने कहां गई चिड़िया !
कुचले – पिछले बदन जहां – तहां
जमा हुआ खून
हत्यारी आंधी के बाद
क्या इस तरह बदल जाता मानसून ?
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता एक अस्पष्ट हादसे पर अस्पष्ट बयान सा है ।कविता में चिड़िया जैसे मामूली पक्षी के कुचलने का दर्द उभर कर आया है ।मौत किसी की भी हो वह मामूली नहीं होती ।वह एक भरपूर वाकया है मनुष्य की अन्त:स्तल को झकझोर देने के लिए । दूध दुहना एक सामान्य प्रक्रिया है ।एक पावन कर्म है ।जिस तरह पूजा हो या भजन हो या कीर्तन हो ,या प्रवचन सभा हो ,या तीर्थराज का तीर्थाटन हो ,या महाकुंभ का स्नान ,ध्यान और दान की बेला हो ।ये सब समान रुप से आस्था के केन्द्र ही हैं ।इन सब धार्मिक कर्म करते हुए जब मनुष्य हादसे में अपने प्राण त्याग करता है तो फिर वह सामान्य मृत्यु नही अकाल मृत्यु की वजहें बन जाती हैं ? यहां – वहां लाशों के ढेर दिखाई देते हैं और ये मौत के वाकये मनुष्य के इंतजाम और व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं ? तब सत्ता की असफलता और प्रशासन की बद- इंतजाम का सारा प्रमाण जग जाहिर हो जाता है ।दबे – कुचले लोगों को लेकर सत्ता चुप हो जाती है और खून खण्डा होकर जम जाता है ।सूख जाता है ? यहीं से कविता हमें सोचने को विवश करती है कि इन सब पवित्र कामों में जिस तरह हादसों का प्रवेश होता है ।जिस तरह हादसे मौत की रचना करते हैं ? जिस तरह आदमी घटना का निवाला बनता है क्या उस वक्त शासन – प्रशासन जरा भी सावधान और सतर्क नहीं रहता ? क्या वह घटनाओं के घट जाने की प्रतीक्षा करता है ? कोई प्रस्तावित रुप – रेखा नहीं बनाता ? या फिर जनता का अस्तित्व उसकी निगाह में परिन्दों से ,कीड़े – मकोड़े से ज्यादा कुछ नहीं ? यहां – वहां नुचे – खिंचे पंख से बिखरे शव ? क्या सत्ता की सारी संवेदना खतम हो चुकी है ? क्या सत्ता और सरकार की आंख ,कान,और जीभ गल कर गिर चुके हैं ? क्या है यह मखौल ? क्या है जनता के द्वारा निर्वाचित सरकार और हुकुमत की बेरुखी ? हर हादसा हर घटना इसी तरह खण्डा पड़ जाता है चाहे रेल हादसे हों या सड़क दुर्घटना हो ,या हवाई हादसे ? सब में जनता का मरना ,घायल होना एक मजाक होता है ? इन मरने वालों के भी घर – परिवार होते हैं । दुख मनाने और मातम में ग़म ज़िंदा होने वाले होते हैं ।मासूम होते हैं जिन्हें इनकी परवरिश की जरुरत होती है । इन सबसे ऊपर होती है सत्ता की अनदेखी ? सत्ता की लापरवाही ? वर्तमान समय में सत्ता धर्म ,आस्था , और अध्यात्म का भरपूर राजनीतिक दुरूपयोग कर रही है ।धर्म और धार्मिक आयोजन नफरत फैलाने के साधन हैं ।हादसे प्रतिहिंसा ,और बदला लेने के बायस बन चुके हैं ? यह एक विचारणीय सवाल और समय है ? जब मासूमों की मौत एक सवाल बन कर हमारे सामने खड़ी है ? क्या हम धर्म और धार्मिक आयोजनों के बीच घटते हादसों से कोई सबक हासिल करेंगे ? क्या सत्ता को सचेत करेंगे कि हम मनुष्य हैं ?,हम प्राणी हैं ?, हमारे साथ मजलूमों सा व्यवहार न हो ? जनता क्या अपने बुध्दिबल का उपयोग करेगी या हर समय भीड़ बनकर यों ही मृत्यु भरे हादसों का शिकार बनती रहेगी ।शासन – प्रशासन को चुनना ही सत्कर्म नहीं हैं उस पर लगाम नियंत्रण रखना भी जनता की वास्तविक हैसियत है ।यही कर्म भ्रष्ट सत्ता को सचेत ,सतर्क और सजग कर सकता है ।जनता की सजगता ही इन हादसों पर सच्ची रुकावट है अन्यथा हादसे – घटनाएं होती रहेंगी और सत्ता इसी तरह खण्डा रुख अपनाती रहेंगी ? इसी तरह रो – धो कर अपने आंसू जनता ,समाज पोंछता रहेगा ? जनता निरीह नहीं है ? उसके पास आत्मबल है । नैतिकता है । मूल्य चेतना है ।बस एकता नहीं है ? वह जाति , सम्प्रदाय ,समुदाय,धर्म ,मजहब में बंटी हुई है ।जिस दिन धर्म राजनीति के बंधन से मुक्त हो जायेगा उस दिन जनता प्रजा के अस्तित्व से मुक्त हो जायेगी ? जनता की प्रजा रुप का चरित्र मुक्त होना ही मानसून का सही बदलाव है ।धरती के मौसम परिवर्तन में मानसून की बहुत बड़ी भूमिका होती है ।मानसून याने धरती का ब्रह्माण्ड का तापमान बदलने की प्रक्रिया । तापमान में उष्मा जरुर आयेगी ।
विनीता रघुवंशी
