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चमन तो करना ही होगा कविता
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पराग की उत्ताल तरंगों में
इन्द्रधनुष रचना कोई वैसी बात नहीं
किन्तु सम्मोहन का भी एक समय होता है
सिर्फ तितली बनी मत घूमो कविता
फूलों के साथ मुरझाती कलियों भी
हो रहीं पैदा इसी मौसम में
जिनके पास रोने को आंसू तक नहीं
और ऋतुएं गुलाबों के खिले ओठों से सटी
सुन रही लता पत्रों से
दूर्वादल पर टपकती ओस की स्वर लहरियां
एक भरा-पूरा उपवन जरुरी तो है
किन्तु इन भूखी कलियों को भी
चमन तो करना ही होगा कविता —-
इसी मौसम में !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में युवाओं की दुनिया में पसरी मायूसी , बदरंग यथार्थ , बेरोज़गारी , उच्छृंखल मनोवृत्तियों ,नशा ,हिंसा , और उजाड़ बिखरी जीवन स्थितियों के बीच उम्मीद भरे स्वप्न ? स्वप्न बगिया को संवारने के ? ये बगिया है हमारा देश ,हमारा हिन्दुस्तान ,हमारा भारत , हमारा अपना मुल्क ।इसके भीतर जिस तरह का समूह बध्द माफिया विकसित हो चुका है उसने सारे देश की मुस्कान ,खुशी , प्रसन्नता सब को दबोच लिया है ।सत्ता कोमल स्वर लहरियों को सुनने में डूबी है ।वह अपने सपनों की चेतना में खोई है ।उसे जनता या युवाओं के सपनों से कोई मतलब नहीं ।वह तो अपनी अभावों में बनी ग्रन्थियो को पूरा करने और अभाव की मन: स्थितियों से उबरने के लिए एक सत्ता भोग की उच्चतर वृत्तियां , स्थितियां रच रही है ।अपने को ईश्वर स्वरुप में पेश कर रही हैं ? क्या सत्ता पर आसीन नेतृत्व ईश्वर के समकक्ष वैभव वान हो गया है ? जो राग रंग में डूबा हुआ जनता के अकल्पनीय दुखो से बेखबर है ।वह तो अपने ही दुखों को ,अभावों को दूर करने में लीन हैं ।मगन है । सत्ता की इस क्रूरता को तो संवेदना से ही बदलना होगा ।इस भोग मय सत्ता की तासीर को करुणा मय बनाना होगा तब ही यह स्वदेश की धरती चमन होगी । चमन का तात्पर्य है पूर्णतः विकसित भारत ।यह एक जुमला नहीं ।न ही कोई चमत्कार पूर्ण शब्दावली ।न ही कोई अलंकारिक शब्द विन्यास ही है ।यह वह कर्मठ परिश्रम से उपजा विचार है जो भारत के उन्नयन में सामाजिक,आर्थिक, बौध्दिक, राजनीतिक ,अध्यात्मिक , सांस्कृतिक , औद्यौगिक , संवैधानिक भारत की बुनियाद से जुड़ा है ।शब्द जाल में उलझा भारत केवल इस समय उपभोक्ता बना हुआ है ।वह निर्माता और निर्यातक। नहीं वरन वस्तुओं ,टेक्नालाजी का आयातक बना हुआ है ।यह खुद के विसर्जन का मौसम है ।यदि चमन करना है तो प्रतिभा का पलायन और दोहन रोकना होगा ।बौध्दिक स्तर नारों से मुक्त करना होगा तब ही युवा के होंठों पर निर्माण की हंसी बिखरेगी ।तब ही देश चमन होगा ।बागों में बहार बिखरेगी ।यह सब तब ही होगा जब हम अपने देश के प्रति निष्ठा और ईमानदारी के व्यवहार ,सुलूक बरतेंगे ।जब देश में समरुपता होगी ।नफरत की ,हिंसा की आंधियां रुकेंगी ।यह सब तब ही संभव है जब देश के प्रति हमारे मन में ,दिल में ,दिमाग में संवेदनशील वृत्तियां हों ।धर्म और मजहब में परस्पर भरोसा और लगाव हो ।यह सब देशवासियों को ही मिटाना होगा । बर्बाद भारत भूमि को आबाद भारत भूमि तो करना ही है ।यह भावुकता से सोचने पर ही संभव है ।यह एक अहिंसक विचार भूमि है ।जिस पर हर भारतीय को वैचारिक चेतना को उभारना होगा ।
विनीता रघुवंशी
