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मोड़सींग-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
मोड़सींग
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( १)
लंबी कविता का प्रथम अंश
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किसी ने कोई भी शब्द
नहीं सिखाया था तुम्हें मोड़सींग
हर बार चाहा था तुमने पढ़ना
तो तुम
अ आ इ ई उ ऊ सुनते ही
हंसे थे देर तक
पहली बार किसी को
वर्णमाला पर
हंसते देखा था
तब पहली बार
जाना था मैंने कि
वर्णमाला पर भी
हंसा जा सकता है इतना
जब कि तुम
रद्दी कागजों के
टुकड़ों को भी
विद्या की तरह सम्हालते थे
और शहर के
अच्छे – अच्छे विद्याधर
हगते पोथियों पर आज भी
पढ़ते पढ़ाते
कुंजियों के सहारे महाविद्यालय
एक दीवानी औरत
मस्तानी अम्मा ने
एक दिन देखी थी
तुम्हारे हाथ की रेखाएं
और कहा था —
जा पास हो जायेगा
उस दिन भी तुम दोनों
खूब हंसे थे
उस दिन फिर देखी थी मैंने
दो – दो मस्तानी हंसी
फटी गुड़ियों की
अपार सम्पन्नता !
तभी एक नंगा गुजरा था
और तुमने
उतारकर दे दिया
अपना अंगरखा उसे
खुद नंगे हो गये
तब पहली बार जाना था मैंने
दिगम्बर शब्द का अर्थ
दसों दिशाएं हाथ जोड़े
खड़ी थी तुम्हारे सामने
वस्त्र बनकर
उस वक्त तुम
कितने दिग्विजयसिंहों से भी
ज्यादा विजयी लग रहे थे मोड़सींग !
लोगों को तो तमाशा देखने का
लाइलाज मर्ज है पीढ़ियों से
वे सब
तमाशे की तरह
देख रहे थे तुम्हें
और तुम
सड़क – दर – सड़क
सींकें बीन -बीन कर
बनाते रहे झाड़ू
तुम्हें एक खब्त सवार थी
कचरा झाड़ने की
अपने पागल खयालों में
एक साफ सुथरे शहर का
सपना लिए घूमते रहे मोड़सींग !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
हर शहर में होता है एक पागल ।पागल में होती हैं बहुत सी अच्छाई लेकिन पूरे शहर में उसे विक्षिप्त मान लेने की वजह से उसकी अच्छाई उसका खब्ती पन सब पर ध्यान नहीं दिया जाता ? मोड़सींग भी इसी तरह का एक पागल है जिसके संदर्भ मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिला मुख्यालय से जुड़े हैं ।बहुत पहले मोड़सींग रहा करता था राजगढ़ में ।उसे हमने घाटी घूम पर हर बार देखा और जब हम बचपन और किशोर अवस्था में कालेज और स्कूल जाते समय उससे बचकर निकलना है यह ताकीद घर से हमारे कानों में डाल दी जाती थी लेकिन यह भी बहुत अच्छी बात थी कि मोड़सींग कभी भी महिलाओं और बच्चियों को कभी कुछ नहीं कहता सड़क की झाड़ू लगाते हम सबने उसे देखा । वह कुछ चुने हुए लोगों से ही बात करता ।सचमुच बहुत से पागल इसलिए हो जाते हैं कि उनकी संवेदना को गहरा धक्का लगता है और वे उस आघात को बर्दाश्त नहीं कर पाते और उनका मन ,उनकी आत्मा ,उनकी चेतना वहीं की वहीं रुक जाती है ? यह एक मनोवैज्ञानिक आघात होता है जिसको सम्हाल पाना हर एक के बस का नहीं होता ।कुछ लोग अपनी मन: स्थिति को भावुकता के नाज़ुक माहौल के दरम्यान जीते हैं ।इस अवस्था में लगा भावनात्मक आघात उन्हें विचलित कर देता है ।यह अवस्था ही मनोरोग की अवस्था होती है ।मोड़सींग का वर्णमाला पर हंसना कितना प्रतीकात्मक है ? आज तक मनुष्य ने वर्णमाला तो सीखी लेकिन प्रेम का वास्तविक अर्थ आज तक वर्णमाला के अक्षरों को मिलाकर बना नहीं पाये ।वर्णमाला सीख कर मनुष्य। ने व्यावहारिक और व्यवसायिक संसार की भाषा और शब्द तो गुंथे लेकिन प्रेम की भाषा के शब्दों में सात्विक शब्द ,खालिस प्रेम जताते शब्द कहां दे पाई वर्णमाला ? इसीलिए वर्णमाला पर एक पागल ही खुल कर हंस सकता है ? दुनिया भर की जरुरत है प्रेम ? किन्तु प्रेम ही वह आघात है जिससे मनुष्य विक्षिप्तता तक पहुंच सकता है ? प्रेम ही संसार का सबसे बड़ा दरवाजा है जिसमें मनुष्य मात्र ही नहीं प्राणी मात्र समा सकता है । इसलिए पागल वर्णमाला पर हंसता है ? वर्णमाला का कोई अक्षर आज तक सच्चे प्रेम की अनुभूति को व्यक्त नहीं कर पाया ।उसमें स्वर हैं और व्यंजन भी हैं । लेकिन प्रेम रुपी आत्मा ? नहीं है । जब आदमी अपनी चिन्ता छोड़कर किसी और की चिन्ता से व्याकुल हो जाता है तब वह साधारण चेतना का मनुष्य नहीं रहता उसकी चेतना दृष्टि व्यापक मूल्यों की सीमा छू लेती है ।वह दिगम्बर हो जाता है ।दसों दिशाएं उसका आवरण हो जाती है ।दूसरों के दुख की अनुभूति ही तो करुणा का दयार्द्र रुप है ।यही तो अहिंसा की विराट चेतना है जहां मानव मात्र और प्राणीमात्र की चिन्ता का भाव स्फुरण बनता है । मन में चिन्ता है ,चेतना है , संवेदना है ,करुणा है तो मनुष्य पागल है । यही तो वजहें हैं पागल होने की ? यही वर्णमाला है प्रेम के अक्षर चुनने की । मनुष्य व्यावहारिक दुनिया से इतर एक संवेदनशील दुनिया के बीच जिन्दगी बसर करना चाहता है ।किन्तु उलझता है दुनिया के परिवाद में । ( कविता का शेष अंश कल ) 🙏विनीता रघुवंशी

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