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बाज नहीं आयेगा वह
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( ३ )
(लंबी कविता का अंतिम अंश )
अश्वत्थामा के जिस्म – रुह पर
यदि औरत के रुप – रंग का
नशा चढ़ा होता
तो वह
इस नरसंहारणी राजनीति को
कभी का ठिकाने लगा देता
लेकिन द्रोणाचार्य उसे तब
थोथा संयम सिखा रहे थे
कितना आत्मघाती बना उसे
पिता का दिया
यह असंगत व्रत !
अश्वत्थामा यदि
पिता हुआ होता
तो संतति के
संरक्षण का अहसास
हुआ होता उसको भी अपना
लेकिन वह तो अब
मारता झपट्टा बाज सरीखा
नई पीढ़ी पर चाहे जैसा
अब भी
आकाश पर
मंडराता है बाज
देखने कि —-
कहां – कहां सोये चेनुए
कि कहां – कहां
बने घोंसले
कि कहां – कहां
चहकती – फुदकती संस्कृतियां
सबकी टोह लेता
अब भी उड़ रहा बाज
सबके माथे
अपनी तीखी चोंच सम्हाले
बाज नही आयेगा वह
अपनी करनी से
वह धरती पर
आसमान से घात लगा
संहार मचाने आतुर है
उसे कहां पर
कैसे क्या समझाओगे
इसी सोच में डूबा
उत्तर पूछा रहा हूं
तुम से ,तुम सबसे मैं !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता का अंश बहुत ही मार्मिक और संवेदना से भरा हुआ है ।इस अंश में वह आत्मबोध भी है जिसका अनुभव युवा पीढ़ी को अवश्य होना चाहिए । युवाओं को जब तक पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाने का अहसास नहीं होगा तब तक वह पीढ़ी के संरक्षण और ब्रह्मचर्य के आत्म ज्ञान से वाकिफ भी नहीं होगी । ब्रह्मचर्य कोरा शब्द भर बनकर रह जायेगा ।उसका वास्तविक अर्थ तो गृहस्थ जीवन के दायित्व का निर्वहन करके ही समझा जा सकता है ।गुरु द्रोणाचार्य हो या कोई भी ऐसा संगठन जो युवाओं को ब्रह्मचर्य का कठिन तप दिलाकर राष्ट्र भक्ति ,समाज भक्ति की दीक्षा देता है वह सब युवा पीढ़ी के साथ किये गये अन्याय के समान ही है ।यह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन तब ही सही ढंग से हो सकता है जब गृहस्थ जीवन का अनुभव , उसके दायित्व ,पालन -पोषण , पितृत्व की कोमल अनुभूति ,संरक्षण का अहसास आना एक युवा को परिपक्व बनाता है ।गृहस्थ जीवन का अनुभव भोग के जितने निकट है उतना ही वह दायित्व के कठिन अनुभव के नजदीक है ।संसार की समस्त गतिविधियों के बीच से गुजरना और फिर ब्रह्मचर्य जैसे व्रत का कठिन संयम का पालन यही संयम मनुष्य के वास्तविक चरित्र को गढता है । ब्रह्मचर्य के बहुत से पालक , व्रती ,अपने संयम को बहुत काल तक सम्हाले नहीं रख सके और उनका यह व्रत बीच में ही भंग हो गया ।यह मनोवैज्ञानिक भी है कि जब तक किसी व्रत ,संयम का पालन निजी जीवन की जरुरत न हो तो उसे लेना भी नहीं चाहिए और न उसकी शिक्षा – दीक्षा ही दी जानी चाहिए ।विशेष रुप से युवाओं के सपनों, संकल्पों ,और व्रतों को उन्हें खुद स्वीकारना ,चुनना ,या त्यागने की चेतना उनमें खुद होना चाहिए ।एक वयस्क युवा अपने आत्म – निर्णय ,अपने आत्म विश्वास, अपने आत्म बल आत्म बोध का स्वतंत्र चेता होता है ,दृढ़ व्रती होता है उसकी चेतना का निर्णायक एक बुजुर्ग पीढ़ी कैसे हो सकती है ।युवा जीवन का अनुभव हर बार अलग और स्वतंत्र होता है । यह उस दीक्षा पध्दति पर भी गहरा सवाल है जिसमें संयम के नाम पर ब्रह्मचर्य की दीक्षा ,संकल्प, शपथ दिलाई जाती है ।उस युवा के लिए यह शपथ और संकल्प और व्रत व्यर्थ ही है जो अभी किशोर है । अवयस्क है । जिसने जीवन की पाठशाला में कदम भी नहीं रखा ? कहां जाता है कि गृहस्थ जीवन ही जीवन की सच्ची पाठशाला है जिसमें जीवन के सबक खुद हासिल होते हैं ।सच है इन अनुभव हीन युवाओं के बाज जैसे झपट्टो को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक ये कुंवारे,कच्चे मिट्टी के ढेले हैं ? इन्हें जीवन की पाठशाला में उतरने का अवसर दिया जाना चाहिए तब ही ब्रह्मचर्य जैसे समर्थ व्रत का सार्थक पालन संभव है ।यह एक राष्ट्रीय संगठन की कार्यशैली पर भी संकेत करता है । अश्वत्थामा का जीवन एक भटके हुए उच्छृंखल युवा का दायित्व हीन जीवन का प्रतीक है ।पिता द्रोणाचार्य जैसे विद्वान के हाथों विफल पुत्र का व्यक्तित्व निर्माण ।यह महाभारत के चरित्रों में सबसे ज्यादा सवाल उठाता चरित्र है ।हमें भी अपनी पीढ़ियों के प्रति सजग तो रहना चाहिए लेकिन जीवन में उनकी भूमिका को लेकर निर्णय उन्हें ही लेने दिए जाने चाहिए । युवाओं को उनकी मस्तक मणि अर्थात बुध्दि को स्वयं परिपक्व करने देना चाहिए । युवा संहार के नहीं सृजन को आतुर हों यही उनकी चेतना की सही दिशा है । अश्वत्थामा की चेतना संहार की चेतना थी ।
विनीता रघुवंशी
