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बाज नहीं आयेगा वह
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( २ )
दुर्योधन तो पराजयी
परवशता से पागल हो
जीवन के अन्तिम प्रतिशोधी क्षण में
नारियल की तरह
भट्टाभट्ट फोड़ना चाहता था
पांडवों के सिर
लेकिन अश्वत्थामा ने जो दिये उसे
वे मासूमों के सिर निकले
जो नहीं जानते थे
मां के सिवाय
किसी ओर की छुअन तलक
आगत पीढ़ी का क्या होगा
यह सोचते ही
जो धक्का लगा दुर्योधन को
अपने अंतिम क्षण में, वह —-
भीम के वजृ से ज्यादा भारी रहा होगा !
मरते समय दिया था
दुर्योधन ने जो शाप
मित्र घाती अश्वत्थामा को
उसी से ग्रसित भटक रहा वह
हिमाच्छादित घाटी में अब भी
अकेला , बिलकुल अकेला
भटक रहा अश्वत्थामा अब भी
रिस रहा उसका नासूर
असहृय वेदना से पागल वह
कुछ भी नहीं सोच पाता
मंदिर ,मस्जिद , गुरुद्वारों में
घुस आंतक मचाता
चाहे जब उत्पाती होकर
पी जाता बादल
औलों की बौछारों से रौंद रौंद
चौपट कर देता फसलें
सोख लेता नदियां
उठाता तूफान
फैलाता महामारियां
और बन कर चम्पतिया
उठा ले जाता
मासूम बच्चों को घर आंगन से
माताएं रोती और बिलखती
रह जाती हैं अब भी
ब्रह्मास्त्र का विध्वंस अब भी
चकरघिन्नी किये है उसे
जबकि वह
तभी हो चुका था निष्फल
कृष्ण की लोक कल्याणी सूझ से !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
लम्बी कविता के दूसरे अंश में प्रकृति के द्वारा किये जा रहे समस्त अतिचार शायद दुर्योधन के अंतिम समय में अश्वत्थामा को दिये गये शाप का ही प्रतिफल है । दुर्योधन जो कि अपनी प्रकृति से क्रूर और अन्यायी , अमानवीय अप कृत्यो का पक्षधर था लेकिन अपने मित्र अश्वत्थामा के किये अपकृत्य द्रौपदी के पांचों शिशुओं के सर काट लेंने की जो घटना है वह दुर्योधन जैसे क्रूर हृदय को भी पिघला देती है ? वह भावी पीढ़ी की चिन्ता से विचलित हो जाता है ? इस बार द्रोपदी के पुत्रों की मृत्यु पर वह अट्टाहास नही कर पाता ।इस बार उसकी संवेदना मोम की तरह पिघलती है और मित्र अश्वत्थामा को उसके घनघोर बुध्दि हीन कर्म पर कुपित होती है । युध्दोन्माद भले ही विचार विहीन कर्म है लेकिन फिर भी युध्द की विभीषिका से भावी पीढ़ियों को सुरक्षित रखा जाता है ।आज यूक्रेन और रुस , इस्राइल और हमास के युध्द में जो बचपन पीढीत हो रहा है वह भी तो अश्वत्थामा की बुध्दि हीनता का सड़ा घाव ही है ।यह चरित्र जो वेदव्यास ने अपनी महाभारत की रचना में जीवित किया वह आज भी यहां – वहां भटकता हुआ मानव समाज को कष्ट पहुंचा रहा है ।यह चरित्र युवा है जो अपनी शक्ति, अपनी बुध्दि,अपने आत्म बल का , अपने सीखें हुए युध्द के तरीकों का उपयोग वह मानव घात में कर रहा है ।आज विश्व की सत्ता यदि किसी पीढ़ी को भरमा रही है तो वह पीढ़ी युवा पीढ़ी ही है जो सब खोकर भी सब कुछ पाना चाहती है ? यही तो विडंबना है ? जब सब नष्ट हो जायेगा तो पाने को कुछ रहेगा ही नहीं ? यह वह युवा पीढ़ी जिसका उपयोग आंतक मचाने के लिए किया जा रहा है जो मंदिर,मस्जिद ,गुरुद्वारे में घुस कर अश्वत्थामा का ही रुप धारण किये हैं जो शापित ही बुध्दि हीनता के लिए है ।यह महाभारत काल से अपने बुद्धि विवेक रुपी मस्तक मणि को खो चुकी है ।सभी प्राकृतिक प्रकोप के लिए यही जिम्मेदार है ।तूफान यदि कहीं आया है तो वह अश्वत्थामा को मिले शाप के परिणाम स्वरुप ही है , कहीं नदियां सूखी तो वह भी इसी कारण से ,ओलों की बौछार यदि कहीं पड़ रही तो उसके पीछे दुर्योधन का श्राप ही है ,बादल कहीं सूखा बन रहे हैं तो वह भी यही शाप है ? चम्पतिया का रुप धर कर घर आंगन से मासूम बच्चो को अगवा करने का कृत्य भी अश्वत्थामा का ही है।? युग बदल गये लेकिन अश्वत्थामा के द्वारा पीढियो पर किये गये कृत्य नहीं बदले ।आज भी द्रोपदी से लेकर आज तक मां अपने नन्हें मुन्नों के लिए आंसू बहा रही है बिलख रही है चम्पतिया बना अश्वत्थामा आज भी भटक रहा है अकेला , बिलकुल अकेला घायल अकेला ।अपने अन्तर में शाप का नासूर लिए । अश्वत्थामा के पास अपनी शाप मुक्ति का कोई उपाय नहीं है ? भावी पीढ़ी को नष्ट करने का दण्ड भोगता अश्वत्थामा ? यह अक्षम्य अपराध है अपनी भावी पीढ़ी को खतम करना ।यह कृत्य इसलिए भी क्षमा योग्य नहीं है क्योंकि यह अपराध समूचे समाज के साथ किया गया है ।इससे आने वाली कई पीढ़ियों पर प्रभाव पड़ता है । ब्रह्मास्त्र की विद्या गुरु द्रोणाचार्य ने अपने पुत्र मोह में फंसकर केवल अश्वत्थामा को ही सिखाई थी उसी का भ्रम पाले उन्मत्त अश्वत्थामा आज भी मद में चूर होकर घूम रहा है जब कि श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ पर उसका प्रयोग करवा कर नष्ट अश्वत्थामा की वह शक्ति छीन ली थी यह कृष्ण की लोक कल्याणी सूझ समझ थी जिससे संसार का भौतिक नाश होने से बच गया ।यदि हमारा नेतृत्व कर्ता लोक कल्याण की दृष्टि सम्पन्न है तो फिर संसार के भौतिक , विज्ञान, वैश्विक, मानव कल्याण की दृष्टि परिपक्वता होनी ही चाहिए ।तब ही युवा का भटकाव रुकेगा । दृष्टि हीन अश्वत्थामा हो या युवा पीढ़ी उसके पास लोक दृष्टि अवश्य होना चाहिए ।
विनीता रघुवंशी
