4
बाज नहीं आयेगा वह
*****************
( १ )
(लम्बी कविता का अंश )
तुमने, “अश्वत्थामा नरों वा कुंजरों वा “
कहला कर
युधिष्ठिर के सत्य पर
जो स्याही पुतवाई
उसने एक ही झटके में
ले लिये हाथी के प्राण
किन्तु अश्वत्थामा का
नहीं हो सका बाल बांका
तुम्हारा यह वाक्य
लिखते हुए
क्या बीती होगी
गणेश पर
इसे ताड़ लेते तब तुम
तो इतिहास तुम्हारा
जो पुराण कहलाया आगे चलकर
कुछ और
अनोखी घटना का
संघर्षण होता वेदव्यास !
द्रौपदी के
पांचों शिशुओं के
युद्धोपरांत सिर काट
निपूति कर उस मां को
जब हिंसा की
खुशी से उन्मत्त हो
भागता – सा चला था
शिविर से अश्वत्थामा
तभी लग गया था कलंक
उसके मस्तक पर
शिशु घाती होने का
एक ही झटके से
पीतल में तभी
फिंका गई थी मानो मस्तकमणि
बुध्दि हीनता का सड़ा घाव
कभी भरता नहीं
नहीं भरता वेदव्यास !
इसीलिए तो आज भी
उसकी जलन शान्ति को
चाहे जिस राहगीर का पथ रोके
नवनीत मांगता फिरता अश्वत्थामा !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में सवाल आदिकवि वेदव्यास से जवाब पूछा जा रहा है ? किस बात पर जहां गणेश की लेखनी से एक झूठ का लिखवाया जाना किस तरह पूरे इतिहास के यथार्थ की दिशा मोड़ देता है ।यह लेखक की भी जिम्मेदारी होती है कि वह हर समय अपने समय के सत्य को ही लिखे । महाभारत काल की इस महत्वपूर्ण प्रसंग में इतिहास का एक बड़ा सवाल गुंथा हुआ है ।वेदव्यास रचनाकार हैं और गणेश लिपिकार । युधिष्ठिर महाभारत के मुख्य पात्र हैं ।जब युधिष्ठिर से यह वाक्य कहलाया जाता है कि अश्वत्थामा मारा गया यह नहीं जानता कि वह नर है या हाथी ? अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र हैं । गुरु द्रोणाचार्य दुर्योधन की ओर से पांडवों की सेना पर जबरदस्त प्रहार कर रहे हैं ।पांडव सेना आहत हो रही है इसी से गुरु द्रोणाचार्य को विचलित करने के लिए युधिष्ठिर के सत्य भाषी होने के कारण यह कथन उच्चरित करता गया युध्द के मैदान में ।गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर का यह उद्घोष सुना और अपना धनुष बाण हाथ से छोड़ दिया ? पांडवों को इससे राहत मिली ? यह सब प्रसंग है । लेकिन इस कथन ने पूरे इतिहास को विकृत कर दिया ? यह भी विचार किया जाना चाहिए कि युवा पीढ़ी केवल युध्द में झौंकने के लिए ही है जिस तरह अश्वत्थामा जैसे युवा का इस्तेमाल सत्ता ने अगली पीढ़ी को खतम करने के लिए किया ? जब वेदव्यास यह कथन लिपि बध्द करवा रहे थे तब श्री गणेश के मन पर ,विवेक पर और अंगुली में पकड़ी गई लेखनी ,उनकी संवेदना कितनी कांपी होगी ? क्या श्री गणेश ने अश्वत्थामा के अपकृत्य द्रोपदी के मासूम शिशुओं का सिर जब हिंसा से उन्मत्त हो काट कर आने की घटना को लिपिबध्द किया होगा ।एक लेखक ,एक लिपिकार बिना विचार और संवेदना के कैसे अप्रभावित रह सकता है ? वेदव्यास स्रष्टा थे लेकिन श्री गणेश की संवेदना और करुणा संदिग्ध हो जाती है ।एक कथन में समेटा गया एक झूठ किस तरह युवा पीढ़ी को हिंसक और प्रतिहिंसक बना सकती है ।यह हमें महाभारत का यह प्रसंग समझाता है । अश्वत्थामा वह युवा पीढ़ी है जिसने पिता के भाव का अनुभव नहीं किया ?जिसे संयम सिखाया गया ? युध्द की विभीषिका हर समय समय को नुक़सान ही पहुंचाती है ? युध्द चाहे महाभारत हो ,विश्व युद्ध हो या यूक्रेन और रुस का हो या इस्राइल फिलिस्तीन का हो सब समाज पर बुरा असर ही छोड़ते हैं ।पीढ़िया नष्ट ही होती है ।मां चाहे मासूमों की हो या युवाओं की जब जब भी युध्द रचे जायेंगे तब तब मां ही निपूति होगी ? युवा हर तरह से हिंसा से उन्मत्त ही होगा ।हर बार उसकी बुध्दि मणि याने विचार करने की सामर्थ्य निकाल दी जायेगी ? वह मस्तक मणि विहीन एक युवा सतत भटक रहा है ।ऐसी किंवदंती भी है कि अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और भटक रहा है । वनों- वनों प्रांनतर- प्रांनतर जब भी वह राहगीर को मिलता है तो नवनीत मांगता है अपने सिर के घाव की जलन को शान्त करने के लिए ।यह सत्य हो या न भी हो । लेकिन वेदव्यास द्वारा रची महाभारत में युवा अश्वत्थामा का जिस तरह का पात्र रचा गया वह बहुत ही समाज घाती और उन्मत्त हिंसा का प्रतीक है ? यह वेदव्यास की बुध्दि हीनता का सड़ा घाव है जो कभी भी नहीं भरेगा ? इतिहास हो या कथा या कविता यदि उसमें पात्र का चरित्र एक बार पराभव के उन्माद के बीच फिसल जाता है तो वह फिर आदर्श की सीमा में नहीं लौट सकता है । वेदव्यास की ही यह सबसे बड़ी खामी रही कि वे युवा अश्वत्थामा का चित्रण गंभीरता से नहीं रच पाये । इसीलिए आज भी युवा पीढ़ी का इस्तेमाल बुध्दि हीन , मस्तक मणि विहीन मानकर किया जाता है ।युवा पीढ़ी उत्साह से , उमंगों से जरूर भरी होती है लेकिन वैचारिक जमीन उनकी कमजोर होती है । स्वप्नमयी दृष्टि दूर तक नहीं देख पाती ।यही उनकी दृष्टि ,चेतना और संवेदना की जमीन को कमजोर करता है । अश्वत्थामा का हाहाकार वेदव्यास के लेखन की भी कमजोरी है ।यह इतिहास की सबसे बड़ी विकृत घटना है ।कविता बहुत गंभीर और गहराई से पढ़ी जाने की मांग करती है ।
विनीता रघुवंशी
