4
छोड़ दिए जाते बेगुनाह
*******************
( ४ )
(कविता का अंतिम अंश )
अंतरिक्ष की ऊंचाइयों से
बर्फ की
पवित्र चादर ओढ़े
एक विराट नीलम की
दमक से भी अधिक
आकर्षक लगनेवाली यह धरती
कर रही निरंतर
सूर्य को परिक्रमा रत प्रणाम
और हम सब
कोई एक मस्जिद
कोई एक मन्दिर
कोई एक गिरजा ,गुरुद्वारे को
माथे पर उठाये
इसी दिव्यता को मिटाने में
जुटे हैं सुबह – शाम
गिरवी रख दिया है खुद को
हैवानियत के नाम
बापू, तुम जिस आत्मबल से
पोंछा करते थे
इस नीलमणि को
तह पर लगी धूल
आज उसी ताकत को
छीन रहे हमसे
भाषणों के
आरक्षित वनों के पशु
कभी कभार विशेष अवसरों पर
अपनी मांद से निकल कर
ये सभी —
सिखाने आये —- आहार ,निद्रा ,भय,
मैथुन के उज्जवल पक्ष
केंचुओं- सा चाहे जिधर रेंगनेवाला
दिशाहीन जन मानस
छाया रहता सदैव इनके समक्ष
किसे फुरसत है
जो करें इन सबसे
इस छीना – छपटी की तहकीकात
किसे पड़ी है कि डाले
सांप के बिलों में हाथ
लेकिन मैं देख रहा हूं कि
इन सबसे हटकर
एक तरफ कर्मरत मनुष्य
शान्ति की कोख में भी
कर रहे धरती आकाश एक
इनके ही —
वैज्ञानिक सोच – संस्कारों से
खिलेगा विवेक
गूंजेगी घर – घर
सत्य संवेदन की मधुर टेक !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज की कविता एक उम्मीद पर विराम लेती है ।उम्मीद है भारतीय चेतना के बदलाव की । मनुष्य ने विज्ञान में इतनी तरक्की की वह चांद की धरती को छू आया ,और भारतीय समाज चेतना आज भी हिन्दु – मुस्लिम के फेर में उलझा अपने ही समाज को नुक़सान पहुंचा रहा है ? यह विचारणीय बात है । भारतीय समाज की चेतना और संवेदना को इतना तो परिष्कृत होना ही चाहिए कि वह अपने हानि पहुंचाने वाले तत्वों को और तथ्यों को जान समझ सके ।कौन सी विचारधारा समाज हित में है ? कौन सी जीवन दृष्टि से समाज उन्नयन होगा यह समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है ।आज की संकीर्ण राजनीति ने भारतीय समाज की युवा पीढ़ी को बहुत नुकसान पहुंचाया । भारत के राजनीतिक दल समय समय पर यात्राएं निकालते रहे और भारत पर धार्मिक रंगों से सराबोर रंग छाता रहा ।भारत में हिन्दुत्व और मुस्लिम धर्म की पताकाएं युवाओं की दृष्टि को , ऐतिहासिक चेतना को , और राष्ट्र निष्ठा,भक्ति को पाखंड में बदलती गई ।धर्म युवा के मस्तिष्क में , बाजुओं में , चिन्ता में ,और काम – धाम में याने रोजगार में बदल गया । नब्बे के दशक में राजनीतिक यात्राओं के मुख्य उद्देश्य यही रहे । आज वर्तमान युवा पीढ़ी जब रोजगार विहीन बनी निरुद्देश्य बनी बेरोजगार हैं तब सत्ता उसका तमाशा देख रही है ।उसके पास अब न तो विचार है न उपाय ही है।वह राजनीतिक ठगी का और निकम्मेपन का शिकार बना दी गयी है ।जो साजिश भारत की आजादी से पहले ही रुप – आकार ग्रहण कर रहा था वह आज वर्तमान समय में सत्ता में काबिज देखा जा सकता है ।यह वर्तमान ही उस दृष्टिहीन सत्ता धारकों का सत्य है जो झूठ की पीठ पर सवार होकर आज भारतीय जन मानस को केंचुआ जैसे लिजलिजे जीव में बदल रहा है ।यह जन मानस यथास्थिति वादी और समझौता परस्त हो चुका है ।अपनी संघर्ष चेतना खो चुका है ।अपनी विरोध और असहमतियों की सामर्थ्य विस्मृत कर चुका है । इसीलिए इसने अपनी गौरव शाली संस्कृति की नीलाभा दमक को खोकर आत्मबल विहीन हो चुका है ? यह सब भारतीय समाज को विचार में सोचने समझने में शामिल करना चाहिए या नहीं ।महात्मा गांधी के पास आत्मबल और दृष्टि में नैतिकता थी जिससे ब्रिटिश हुकुमत भयभीत होती थी ।तन पर लंगोटी और हाथ में लाठी लिए बापू सबके सामने अपने देश के लिए संघर्ष करता था ।सत्य के लिए आग्रह और त्यागने की चेतना थी , अपने कुटीर उद्योग ,अपनी विरासत की रक्षा ,अपने देश की स्वायत शिक्षा , चिकित्सा सब पर बापू ने विचार किया और उनके बाद का भारत आराम तलब हो गया । समझौतावादी हो गया । संविधान की लकीरें और ताकीदे अनदेखी की जाने लगी ।आज स्थिति यह है कि सभी संवैधानिक संस्थाओं को रीढ़ विहीन बना कर संविधान का भय ही मिटाने की चालें चली जा रही है ।जिस दिन भारतीय समाज में आत्मबल पैदा होगा ? जिस दिन भारतीय समाज की चेतना का स्फुरण होगा ? जिस दिन देश की मिट्टी में प्राण समायेंगे ? जिस दिन बापू की चेतना संवेदना, सत्य , अहिंसा ,का साक्षात्कार भारतीय जन मानस में स्वत: आत्म स्फूर्त होगा उस दिन यह हिंसा ,यह नफरत, यह अशान्ति का मिथ्या आवरण टूटकर गिर जायेगा ।जब घर – घर महात्मा गांधी का अवतरण भारतीय तन मन में और विचार बन जायेगा । उस दिन गांधी की हत्या का वास्तविक पश्चाताप और प्रायश्चित भी होगा। भारतीय समाज की चिन्तन धारा की दिशा राष्ट्रीयता की ओर होना चाहिए । सत्ता की खुदगर्जी और सत्ता को अधिकृत करने की वैचारिक साजिश रचता शासन – प्रशासन के मुखौटे भी उतरने चाहिए ।
विनीता रघुवंशी
