Home आज की कवितामोड़सींग-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

मोड़सींग-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
मोड़सींग
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( २ )
सिर से पांवों तक
झाड़ुओं की सीटें खोंसे
तुम जहां – जहां जाते
वहां – वहां लहरा उठती
एक रंगीन झील
जिसमें तैरते थिरकते बच्चे
केलियां करते थे तुम्हारे साथ
मैंने पहली बार जाना मोड़सींग !
कि सफाई के ख्याल से भी
पागल हो सकता है आदमी !!
उस दिन किसी की गुलेल से
घायल चिड़िया को लिए
रोते रहे थे
जोर- जोर से दिनभर
लोग तुम्हें
पागल -पागल कहकर
ले रहे थे मजा
लेकिन जिस वक्त
मरी चिड़िया को
नेवज नदी की धार में
बहाने के बाद
किनारे पड़ी
लोहे की पत्ती को उठा कर तुम
पत्थर पर घिसते हुए
अंगूठा फेर ,फेर कर
बना रहे थे उस पर धार
उस वक्त तुम्हारी आंखों में
अमन के लिए
दुनिया भर के चिड़ीमारों की
तलाश जारी थी
मैंने पहली बार
ठीक से जाना मोड़सींग !
कि मासूम चिड़िया की हत्या
आदमी को पागल कर सकती है !!
उस दिन आधी रात बीते
बस स्टैण्ड वाली पगली के साथ
सिपाही की हरकतों पर
जो प्रतिकार किया था तुमने
उसे मैं भुला नहीं सकता कभी
तुम्हारी एक ही हुंकार से
गीली हो गई थी
कलफदार कड़क वर्दी
और तुमने
मरते दम तक भी
गुदड़ी खराब नहीं की अपनी
मैंने पहली बार
ठीक से जाना मोड़सींग !
कि कबीर की चदरिया का
क्या अर्थ रहा होगा !!
तुम जहां भी मिलते थे
पकड़ा देते थे मुझे
टूटी झाड़ू
या मैली जिन्दगियां
कहते हुए कि —
‘म्हारा माण्डा में आजो ‘
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
पागल व्यक्ति सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है ।जो संवेदनशील नहीं है वह किसी भी आघात को सामान्य ढंग से सह जाते हैं ।उन पर वैसा असर या प्रभाव नहीं दिखता जैसा संवेदनशील मनुष्य के चित्त ,मन और आत्मा पर उस घटना की लकीरें स्मृति की अमिट छाप बन जाती है समय कितना भी गुजर जाये लेकिन आघात की स्मृतियां मिटती नहीं है अवसाद के रुप में स्थिर हो जाती है ।मोड़सींग भी इसी तरह का पागल है ? जिस के पास खब्त सवार है शहर को साफ करने की ,जिसके पास ख्याल है अमन की दशा बनाने का ,जिसके पास हिंसक मनोवृत्ति के लोगो के लिए हथियार है लोहे की तेज धार वाली पत्ती ।जिसके पास आंसूओं की धार है चिड़ियां की हत्या पर ।यह सब संवेदनशील माहौल है उसके भीतर उसकी मनोदशा में ।जबकि पूरा शहर उसके पागलपन को तमाशे की तरह मजा लेता है ।क्योंकि शहर ने इन सब पर विचार करना कब का छोड़ दिया है ? छोड़ दिया है इसीलिए शहर बदबू के ढेर में तब्दील हो गये ? अब शहरों में अकेली चिड़ियां नहीं मारी जा रही ,अब तो आदमी को कत्ल किया जा रहा है और आदमी के पास आंसू सूख चुके हैं कोई फर्क नहीं पड़ रहा उसके मरने से ? गुलेल नहीं अब आदमी के हाथों में बन्दूकें , पिस्तौलें,चाकू, छुरे और न जाने क्या- क्या है , बस आंसू और चेतना नहीं है ? किसी को बचाने की फ़िक्र नहीं है और न ही खुद के मर जाने का भय ही है ? बहुत मामूली सी वजहें हो सकती है पागल होने के लिए ? मोड़सींग भी पागल है लेकिन उसकी चिन्ता में शहर की सफाई है ,चिड़िया की हत्या है , वर्णमाला है जिसमें प्रेम का स्वर नहीं है ? जो भाषा की सभ्यता और संस्कृति की चेतना सिखाती है लेकिन मनुष्यता के अक्षर कहां है ? इसलिए वह हंसने की बात है ? मनुष्य ने वर्णमाला सीखी लेकिन प्रेम की भाषा तो सीख ही नहीं पाया ? यही तो वजह है कि आदमी को वर्णमाला केवल खुदगर्जी के हरुफ सिखाती है । मनुष्यता सिखाए वह वर्णमाला कहां है ? कविता में बहुत गहरी बात छुपी है ।पीढ़ियां तमाशे बाज है ? वह अपनी हर निजता का ,अपनी कमजोरियों का ,अपनी संवेदना का,अपनी करुणा का ,अपनी सत्ता का,अपने त्याग का ,अपने कर्त्तव्य का ,अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का तमाशा बनाती है ? ठीक से समाधान की दिशा को नहीं चुन पाती ? यह विडम्बना ही है ।समाधान दिखाया था महात्मा गांधी जी ने लेकिन हमने उन्हें भी दर किनार कर दिया ? कहां है हमारी चेतना में गांधी और उनका रास्ता? यदि होते गांधी हमारी चेतना में तो सफाई की चिन्ता में मोड़सींग नहीं होता ,सड़क- दर -सड़क झाड़ू लगाता एक पागल । आज शहर में ,गांव में बस्तियों में बसे नागरिक की चेतना और चिन्ता में कहां है शहर की सफाई ? ये शहर की सेहत से जुड़ा मसला है ? इस पर हमारी चेतना को पागल ही होना होगा ? आज हम शहर में कचरा फेंक कर ,उसे गन्दा करके हाथ झाड़ लेते हैं ? यह वास्तविकता है ।इसी तरह स्त्रियों के अपमान के प्रति हमारे भीतर कहां है हुंकार भरा प्रतिकार ? क्योंकि समाज तमाशे बाज है वह लुटती हुई इज्जत को केवल दृश्य की तरह देखता है ? क्या हम सबकी चेतना और संवेदना पागल हो चुकी है? और एक पागल में संवेदना और चेतना का वह स्तर दिखाई देना मनुष्यता का प्रमाण नहीं ? हम सब दृश्य घटित होते देखते हैं लेकिन हमारी चेतना विक्षिप्त नहीं होती ? हमारी आंखों से आंसू नहीं ढरकते ? हमारे पास हुंकार ही नहीं बची क्योंकि हम सब संस्कार विहीन , चेतना शून्य, बर्बर समाज के अवशेष भर हैं , हिस्से हैं ,हिंसक वृत्तियों के ,शान्ति और अमन,अहिंसा हमारे लिए शब्द हैं आचरण नहीं ? मोड़सींग हमारी चेतना और संवेदना को झकझोरने के लिए पर्याप्त चिन्तन का अवसर है इससे चूकना नहीं चाहिए । 🙏 विनीता रघुवंशी

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