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मोड़सींग
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( ३ )
लंबी कविता का अंतिम अंश
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जब कि सारी बस्ती
गृहस्थिन की तरह
पहनती बदलती रही
चूड़ियां बिछुए
भर्ती – भराती रही मांग
गूंजती रही शहनाइयां
बारहों महीने चौबीसों घण्टे
लेकिन तुम्हारा
मांडा न हो सका मोड़सींग !
और एक दिन तुम
अपनी झाड़ुओं के ढेर पर
जो सोये तो सोये ही रहे
मैं तुम्हारे
अग्निदाह में भी
शामिल न हो सका
जब कि तुम
जहां भी मिलते थे
पकड़ा देते थे टूटी झाड़ू
या मैली चिन्दियां
यह कहते हुए कि —-
‘म्हारा मांडा में आजो ‘
और मैं
तुम्हारे मांगे में
शामिल न हो सका मोड़सींग !
लेकिन मेरे लिए
कितनी ही
पागल उमंगों से भरे
ख्यालों के
साफ – सुथरे
सफेद घोड़े पर सवार
पहने हुए झाड़ुओं का मुकुट
कटार की तरह
टांगे हुए धारदार पत्ती
मांडा कराते हुए
दूल्हा की तरह जिन्दा हो
हमेशा – हमेशा
जिन्दा रहोगे मोड़सींग !
मेरे लिए तुम
मेरे मन के राज -गढ़ के लिए तुम
हम सब के लिए तुम !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
लंबी कविता के अंतिम अंश में अपने शहर की सफाई को लेकर किसी व्यक्ति का पागल हो जाना भी एक संवेदनशील ख्याल है । जिस व्यक्ति ने शहर चेतना की तरह रंग – रंग में बसा लिया हो उस व्यक्ति की मनोदशा का हाल कुछ इसी तरह का हो जाता है । सफाई सेहत की सबसे पहली बुनियाद है ।इस विचार को यदि मनुष्य ने अपने भीतर समा लिया तो फिर वह लापरवाह नहीं रह सकता ।गंदगी तो बहुत सी होती है और मनोविकार भी बहुत से होते हैं । मनुष्य यदि अपनी विकृतियों की ही सफाई कर लें तो फिर समाज तो स्वत: साफ — सुथरा हो ही जायेगा ? ये विकृतियां है जिनका जिक्र कविता में बार बार हुआ है । मनुष्य की घृणा की वृत्ति हो , या संवेदनशून्यत,लोभ हो या लालच , आलस्य हो या भ्रम , लापरवाही या नागरिक चेतना का स्पन्दन हीन होना ,फिर या समझौता परस्त हो जाना हो ,या सब चलता है कब तक परेशान हो ,ये सब छोटी छोटी बात है कह कर भी नहीं टाला जा सकता ।हर छोटी और मामूली दिखने – लगने वाली बात बहुत महत्वपूर्ण भी हो सकती है । दुनिया को साफ – सुथरा बनाने का ख्याल हर हमेशा जिन्दा रहेगा ।हर बार कोई न कोई इस खयाल से पागल होता रहेगा ।वह फिर संत हो या फकीर या कबीर हो या गांधी ? जब तक विचार है तब तक मोड़सींग है ।सफेद घोड़े पर सवार दूल्हा बना या हीरो बना या दुनिया की अगुवाई करता पागल ।खयाल ही है जो आदमी को जिन्दा रखता है ? यदि ख्याल , विचार खतम तो आदमी भी खतम ? आज आदमी इसीलिए खत्म है क्योंकि उसके भीतर खयाल,विचार खतम हो गये ? उसके पास बस बचा है अनुकरण,नकल , वर्तमान में वह केवल भीड़ है ? उसमें आदमीयत नहीं है ।उसकी हैसियत ही नहीं बची आदमीयत होने की ? वह ललचाया हुआ आदमी है ? प्रलोभन से रचा – बसा आदमी ? मामूली आदमी ? यदि वास्तविक आदमी बनना है तो अपने भीतर ख्यालों को पैदा करना होगा ? विचार पैदा करने होंगे ? अपने भीतर संघर्ष चेतना और संवेदना जगानी होगी ? तब वास्तविक आदमी का सृजन होगा ।अन्यथा आधा – अधूरा अपनी वासनाओं और अरमानों के साथ यहां – वहां भटकता मिलेगा आदमी वह सच्चा आदमी नहीं होगा ? वह आदमी का क्लोन होगा ? मोड़सींग हमें हमारी हकीकत से रु – ब – रु कराता है ।
विनीता रघुवंशी
