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चौदह चित्र :कविताएं
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छत पर बैठे हुए –७
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डैनों से
बार – बार संतुलन साधे
आखिरकार
नीम की पतली छुगनी पर
बैठ गई बगुली
डूबते सूरज को
एकटक देखती !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में सूक्ष्म निरीक्षण का कमाल है । समग्र जीवन केवल संतुलन पर ही टिका हुआ है । यदि जीवन में संतुलन बिगड़ जाए तो आदमी और हर प्राणी ,जीव – जन्तु सब का विनाश संभव है ।सारा संसार संतुलन की मिजान याने अनुमान और भरोसे पर ही स्थिर है । जरा सा संतुलन बिगड़ा या नियंत्रण से चूका तो सब कुछ खराब हो सकता है ।कोई भी बड़ी घटना घट सकती है । यह संतुलन वाणी का हो सकता है ,अर्थ याने धन – दौलत ,सम्पत्ति का हो सकता है , यह संतुलन कर्म और अकर्म के बीच का हो सकता है , यह संतुलन सत्ता और शासन के बीच का हो सकता है ,यह संतुलन साधु – संत और मठ – मन्दिर के बीच का हो सकता है , यह संतुलन शिक्षा – दीक्षा के बीच का हो सकता है ,यह संतुलन आदमी की चेतना और जागृति के बीच का हो सकता है । यह संतुलन केवल पक्षियों के डैनों से ही नहीं सकता आदमी को भी अपने जीवन के संतुलन को बनाने के लिए साधना करनी पड़ती है । इसीलिए कवि रहीम कहते हैं —” एके साधे सब सधे , सब साधे सब जाय।
रहिमन मूल ही सींचिबों,फूले – फले अघाय ।। बगुली भी छत से उड़कर नीम की जुगनी तक पहुंच चुकी है । समाज की हर व्यवस्था नीम की तरह कड़वी ही है जहां बैलेंस का साधना बहुत जरुरी है । मनुष्य अपने समग्र जीवन में केवल बैलेंस बनाने के ही प्रयास करता रहता है । कभी वह आमदानी और खर्च के बीच संतुलन बनाता है तो कभी वह देह ,तन और शरीर की सेहत और स्वास्थ्य का बैलेंस बनाता है ।कभी परिवार और परिजनों के बीच सामंजस्य स्थापित करता है तो कभी मितव्ययी होकर खर्चों पर नियंत्रण बैठाता है । इसीलिए महाकवि तुलसीदास जी ने भी कहा है कि —” मुखिया मुख सौं चाहिए । आदमी के अपने जीवन गत यथार्थ और सपनों में भी संतुलन होना जरुरी है । जीवन का सारा काम केवल बैलेंस पर ही निर्भर है । जहां आदमी सीमा से बाहर हुआ वहां से ही उसका अपने जीवन पर से नियंत्रण खतम हुआ ।वह उपलब्धियों की छुगनी तक तो पहुंच जाता है लेकिन उस पर सतत अपना संतुलन नहीं रख पाता इसलिए उसकी सारी उपलब्धि बेमानी हो जाती है ।जीवन में बैलेंस ही साधना है ।हर ओढ़े हुए को संभालना यही तो जीवन चर्या है । मनुष्य ज्ञान को ओढ़ता है ,धर्म को ओढ़ता है , शिक्षा को ओढ़ता है , आचरण और स्वभाव को ओढ़ता है , कर्म और पाखंड को ओढ़ता है यह सब अनुकरण ही है जो उसने सीखा है ।सीखना ओढ़ना ही होता है । जो ओढ़ा गया है उसे करीने से सम्भालना ही तो हुनर है ।अपने कंधे पर संतुलित करना । यह सब पक्षियों की तरह ही आदमी को भी करना पड़ता है । मनुष्य चतुर हैं और उसके पास शरीर बल के साथ बुध्दि का बल और संबल भी होता है । यह बल पशु – पक्षियों ,जीव – जन्तुओं में भी उनके लघु अथवा दीर्घ कद – काया अनुसार होता है । अध्यात्म में इसीलिए यह उपदेश और निर्देश है मनुष्य के लिए कि उसे अपनी वाचा याने वाणी पर ,मनसा याने मन पर ,और कमर्णा याने कर्म पर संयम रखना चाहिए ।इसी को मन वचन और कर्म का संतुलन कहा गया है ।जो कहा जा रहा है वही किया जाये जो करना है वही मन में सोचा जाये ।इसी को कथनी और करनी का समन्वय कहा गया है ।जीवन भर मनुष्य की एकमेव साधना रहती है कि वह जिंदगी का बैलेंस साध सके ।यह मनुष्य हो या पशु – पक्षी सबके जीवन में रीढ़ का होना ही बैलेंस का होना है ।इस समय आदमी अपनी रीढ़ को खोज रहा है ,और फुनगी पर पहुंच जाना चाहता है ।इन दोनों में तालमेल का होना बेहद जरूरी है ।
विनीता रघुवंशी
