Home आज की कविताचौदह चित्र : कविताएं-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

चौदह चित्र : कविताएं-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
चौदह चित्र : कविताएं
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भींगता रहा –६
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वह एक घंटा – सी
बरस गई
मैं दरख्त सा भींगता रहा
पात – पात से
टपकती रहीं बूंदें
टप्प टप टप् !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
ये कविताएं एक चित्र ,एक दृश्य ,एक रांगोली की आकृति मन में उकेर देती हैं । कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविता पढ़ी नहीं जा रही बल्कि कविताएं एक भाव चित्र मन के पटल पर उभार रहीं हैं ।यह भींगना भी असाधारण है ।आत्म रस में विभोर हो जाना ।जैसे कृष्ण की बांसुरी की स्वर लहरी हो या तबलों पर पड़ती थाप का आनंद हो , या कुमार गंधर्व का कबीर का आलाप सुन कर आत्मा के सब द्वार खुल जाएं । यह भींगना आत्मरस की अनुभूति है । यह जो अमृत का स्राव है जिससे योगी अपनी ब्रह्मरंध्र के कपाट खोल देता हैं ।यह भींगना आत्मा का भींगना है ।यह प्रेम का आत्मानुभव है । इस आनंद में रम कर ही मनुष्य की चेतना जागृत होती है ।जिस तरह बारिश में भींगा वृक्ष बूंद बूंद रिसता रहता है ।पात पात से बूंदें टपकती रहती हैं उसी तरह सरगम के स्वर हैं ,आत्मा की अन्तर लय है जो पर्त पर्त अनुभूति और अनुभव के बंद द्वार हौले हौले खोलती है और मनुष्य का तन मन आत्मा उसमें आनंद विभोर होती जाती है ।यही तो अनिर्वचनीय आनंद है जिसे श्ब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता ।यही तो सच्चा श्रृंगार है । यही तो है प्रेम की सर्वोच्च दशा ।प्रेम में केवल तन ही लीन नहीं होता ।तन की तल्लीन दशा तो भोग है लेकिन जब मन और आत्मा भी उसमें लीन हो जाये तब वह आत्मरति,आत्मरस,और आत्मानंद में परिवर्तित हो जाता है । यह दशा ही तो है भींगने की दशा । एक दरख्त ।एक पेड़।एक नजर बन जाना ,अपने आपको समझ लेना यह आत्म विभोर अवस्था का आनंद है जो आत्मज्ञान को विस्मृत कर चुका है । जिसका आत्म परिचय छूट गया है । यही तो लग्न है ।यही तो चेतना का विस्मरण है । आत्मानुभूति का इस तरह घटा बन कर बरसना किस तरह की जागृति है ? यह अनुभूति अनूठी और अन्तर लय की चेतना का स्फुरण ही तो है । यह भींगना भी अनोखा है जो आत्मरति,आत्म मुग्धता से मुक्त हो जाने की दशा है । यह वह मंद्र स्वर लहरी है जो मनुष्य की चेतना को गुम कर देती है ।यही तो है होश गुम होना ।आत्मा का खो जाना ।यह योग की चरम अवस्था है जिसमें योगी ध्यान में डूबा अमृत का पान करता रहता है । कुण्डलिनी को जागृत कर के सुख और आनंद की प्राप्ति का अनुभव करता है ।यही है ब्रह्मानंद ।यह रचना हमें दर्शन के गहरे मायने समझाने में सफल है ।ये कविता रुपी चित्र केवल शब्द नहीं वरन आत्मा से ,चेतना से , संवेदना से फूटे अनुभूति के गहरे अर्थ हैं । यह गगन दमामे की अनचीन्ही आवाज है जो किसी विरले को ही सुनाई देती है ।हम सब भी भींगते रहे प्रेम के बरसते अद्भुत स्वर लय में । 🙏विनीता रघुवंशी

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