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चौदह चित्र : कविताएं
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क्या करूं : ९
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एक मकड़ी
बिन रुके
बुन रही
जाले अहर्निश
राम जाने
वह थमेगी कब – – – ?
ओ विनीता जिंदगी
कुछ बोल तो
मैं क्या करूं अब – – – ???
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में एक चिन्ता मन में समाए जा रही है ।मकड़ी प्रतीक है जालों की ।बरसों जब घर ,मकान या खण्डहर महल भवन बंद पड़े रहते हैं उनमें किसी प्रकार की रहवास नहीं होती तो छोटे – मोटे जीव- जन्तु उसमें अपना बसेरा बना लेते हैं और मकड़ियां उनमें जाल बुन लेती है । यह व्यवस्था भी एक जाल है जिसमें मनुष्य खोया रहता है । हर तरह से मुक्त लेकिन धारणाएं ,विचार, भ्रम, आस्थाएं , मान्यताएं , कुण्ठाए, ग्रंथियों , तनाव , आदि उसे मुक्त नहीं रखते ।जिंदगी एक विचार है और मनुष्य इस विचार को लेकर ही बहुत सारे मतिभ्रम बुन लेता है जो सच नहीं होते लेकिन जिंदगी गुजार लेने के जरिए जरुर होते हैं ।यह जाल मनुष्य के आसपास धर्म और मजहब का होता है ,सामाजिक स्थिति और सम्मान का भी होता है , अमीरी – गरीबी का भी होता है , पद – प्रतिष्ठा भी ,हैसियत भी एक जाल ही होता है , आत्म सम्मान और सत्ता की ताबेदारी का भी होता है ।यह सब मनुष्य के आसपास व्यवस्था और सत्ता के जाल ही हैं ।आदमी इन में उलझा हुआ कोई बेहतर उपाय खोज नहीं पाता हर बार उसके सामने एक सवाल है जिसको उसे हल करना है ? यह हल उसे जिंदगी नुमा अपने साझा जीवन में से ही खोजनी है ।जाल से मुक्त होना इतना आसान नहीं है ।जाल है आमदानी और मंहगाई के बीच संतुलन बनाए रखने का , जाल है अपने व्यवसाय और चेतना को सम भाव में बनाये रखने का, सत्ता के दबावों को महसूस करते हुए अपने आत्म सम्मान को बचाए रखने का । इन सब के बीच यदि समाधान चाहिए तो बहुत सी कठिनाई , मुश्किलें हैं जिनको पार करना होता है ।जिंदगी है तो अर्थ की समस्या है ,धर्म की समस्या है , सत्ता की समस्या है , अध्यात्म -चिंतन की समस्या है , शिक्षा की समस्या है , स्वास्थ्य की सेहत की समस्या है , मंहगाई और बेरोज़गारी की समस्या है ।ये सब मनुष्य की चेतना के आसपास बुने जाते जाल ही हैं ।जिनसे मुक्त होना बहुत आसान नहीं है ।यह व्यवस्था का जाल है जो मकड़ी के जाल से भी ज्यादा मजबूत और स्थाई है ।यह व्यवस्था की जड़ता का भाव बोध है ।यही आदमी के सामने सबसे बड़ा सवाल भी है कि कब वास्तव में व्यवस्था मानवीय होगी ? कब सत्ता न्याय की पक्षधर होगी ? कब सत्ता सत्य प्रिय होगी ? कब सत्ता के उसूल मनुष्य की चेतना के साथ एक मेक होंगे ? यही चेतनावान, संवेदनशील,और भावुक आदमी के भीतर उठते सवाल है ।जिनकी चिन्ता रात दिन उसे अत्यंत ही खाये जा रही है ।जिंदगी है चेतना से भरी लेकिन चिन्ताओं ने उसकी चेतना और जागृति को छीन लिया है । यह सब विचारणीय है ।व्यवस्था एक मकड़ी है यह अनुभव आत्मानुभूति का विषय है । इस से मुक्त होने के लिए क्या उपाय किया जाये यही चिंतन का विषय है ।
विनीता रघुवंशी
